भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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रोगी की टहल

बहुत लोग समझते हैं कि बीमार को नहलाना न चाहिए। पर याद रखो कि तन्दुरुस्त आदमी की बनिस्वत रोगी को नहलाने की ज्यादा जरूरत है क्योंकि उसके शरीर से स्नान पसीने के रूप में ज्यादा जहर निकलते रहते हैं और चमड़ी साफ न रहने से नये रोगों को पैदा कर देते हैं। कमजोर रोगी को स्पंज-स्नान कराना चाहिए जिसकी विधि हमने अन्यत्र लिख दी है।

हमने अन्यत्र थर्मोमिटर देखने की रीति लिखी है। नाड़ी देखने की रीति भी लिखी है। भिन्न-भिन्न उम्र में नाड़ी बुखार देखना की गति भिन्न होती है वह भी हमने पीछे लिख दिया है। इस बात का बारीकी से खयाल रखा जाय।

बीमार का साँस भी कभी-कभी देखा जाता है। इसकी रीति यह है कि एक हाथ में घड़ी लो और दूसरा रोगी की छाती पर धरो। हर बार जब साँस ले, गिनो।

तुरत के बच्चे का साँस १ मिनट में ४० बार होता है।

२ वर्ष में ..... २८ " "

४ " ..... २५ " "

१० " ..... २० " "

जवान आदमी का ..... १६-१८ बार " "

टहल करनेवाले को, खासकर छूत के बीमार की टहल करने के समय अपने हाथ और अङ्ग की सफाई का पूरा खयाल रखना चाहिए। हैजा, ताऊन, मोतीभर्रा, चेचक आदि के बीमार का