सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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बुखार और उसका इलाज
भीतर पारा भरा रहता है और नलीपर नम्वर लिखे रहते हैं। इसके नीचे के हिस्से को जिसमें पारा भरा रहता है थर्मामीटर बगल में दबाकर रखना चाहिए। पहले वहाँ का पसीना पोंछ लेना चाहिए। बगल में नली इस तरह रखनी चाहिए कि पारे का हिस्सा बाहर न रह जाय। बदने की गर्मी से पारा ऊपर उठेगा। ऊपरी हिस्से में निशान और नम्वर लिखे रहते हैं। पारा जहाँतक उठे उसी हिसाब से बुखार जानना चाहिए। अक्सर चाँई बगल में नली लगाई जाती है पर मुँह में भी लगाते हैं। मुँह में जीभ के नीचे नली लगाना चाहिए। छोटे बच्चों के गुदा में लगाना चाहिए। बुखार को देखने का सबसे अच्छा समय सुबह-शाम है। लेकिन ज्यादा बीमारी हो तो १-१ या २-२ घण्टे में भी देखा जा सकता है।
(तन्दुरुस्त आदमी के शरीर की गर्मी ६०। डिग्री होती है। २५ वर्ष से कम उम्र के आदमी की कुछ ज्यादा होती है। कसरत करने, दौड़ने, छूप में रहने तथा भोजन करने से कुछ बढ़ जाती है और दिन में सोने, थकने आदि से कम हो जाती है।) मामूली बुखार में १०१। डिग्री गर्मी हो तो फिक की बात नहीं है। १०४ डिग्री तक होने से बुखार तेज गिना जाता है, १०६। होने से खतरा और १०८। होने से मृत्यु होती