सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 222 में से
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पीने की चीजों के साथ मूँह के रास्ते, या नाक के रास्ते सांस के साथ हवा में, या कहींसे चमड़ी कट गई हो तो उस रास्ते से। अथवा खटमल, पिस्सू, जूँ, या मच्छर के काटने से जिनके भीतर पहले ही से ये कीड़े होते हैं। इनसे बचने की रीति यह है कि ऐसे रोगियों के कपड़े-लत्ते, बरतन, खाना अलग रखा जाय, और अपने काम में न लिया जाय। रोगी को भी अलग कमरेमें रखा जाय, उसके कपड़े, बरतन काम में लाने से पहले गर्म पानी में खूब उथाल लेने चाहिए और उसका दस्त, पेशाव, थूक बगैरा उठाकर अपने हाथ भी अच्छी तरह साफ कर लेने चाहिए। जहाँ ऐसी बीमारी फैली हो वहाँ से कहीं चला जाना चाहिए और यदि रहना पड़े तो हरी साग-सब्जी और फल खाने छोड़ देना चाहिए। पानी उबाल कर पीना चाहिए। अपने शरीर को जरक लगने से रोकना चाहिए और मक्खी, मच्छर, पिस्सू, आदि के काटने से बचाना चाहिए।
तपेदिक बहुत खराब बीमारी है। इसे क्षय रोग कहते हैं। बहुत होशियारी से इसका जल्द इलाज करने से यह आराम हो सकता है। जिनकी पतली चपटी छातियाँ होती तपेदिक हैं और कन्धे मुके हुए रहते हैं उन्हें इस बीमारी के लगने का डर रहता है। इस बीमार का शुरुमें बज्रन कम होता जाता है। जुकाम-सा मालूम देता है, सूखी खाँसी का धसका चलता रहता है। वे लोग जल्दी थक जाते हैं। कुछ हफ्ते बाद ही उन्हें शाम को हल्का बुखार रहने लगता है। और सुबह-शाम उसके की खाँसी आती है। कुछ दिन बाद रात को पसीना आने लगता है।