सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूगम विक्रिस्ता
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३ किसिम की होती है। एक गांठवाला, दूसरी बिना गाँठ की; इसमें उल्टी या दस्त के रास्ते खून आता है; तीसरी वह जिसमें फेफड़े सूजकर निमोनिया होजाता है। इनमें सबसे खराब वह है जिसमें गाँठ नहीं निकलती। गाँठवाला वह मरीज भी जिसकी बगल में गाँठ हो, ज्यादा खतरनाक है। तीसरी किसिम की ताऊन अकसर आराम हो जाती है। गाँठ पककर फूट जाना आराम होने की निशानी है। बदन पर खून के बिन्ते या दहोरे पड़ जाना बहुत खराब हैं। मुँह, नाक, दस्त और पेशाब के रास्ते खून गिरना भी इसी तरह खतरनाक है। गाँठ का बैठ जाना भी बुरा चिन्ह है। ताऊन का बीमार कुछ घण्टों से लेकर एक महीने तक जिन्दा रह सकता है। कभी-कभी चौबीस घण्टे के अन्दर, कभी दूसरे या तीसरे दिन, और कभी-कभी पाँचवे-छठे और सातवें दिन मरीज मर जाता है। बीमारी ज्यों-ज्यों पुरानी होती है बीमार के बचने की आशा होती जाती है।
पेट में जो कंठुए पड़ जाते हैं, वे लम्बे और गोल होते हैं, इनका छोर तुकौला होता है। ये ४ से ६ इञ्च तक लम्बे होने हैं।
ये छोटी आँतों में होते हैं; पर मेदे में भी जा सकते हैं। कभी-कभी जब उल्टी होती है वे गले तक चढ़ आते हैं। खास-नाली में चले आने से बालक का दम घुटकर मर जाने का बड़ा अन्देशा रहता है। जब बालक के पेट में कंठुए हो जाते हैं तो उसकी भूख बन्द हो जाती है और उसका जी मिचलाने लगता है, कभी-कभी पेट में दर्द भी होने