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सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

सूगम विक्रिस्ता

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३ किसिम की होती है। एक गांठवाला, दूसरी बिना गाँठ की; इसमें उल्टी या दस्त के रास्ते खून आता है; तीसरी वह जिसमें फेफड़े सूजकर निमोनिया होजाता है। इनमें सबसे खराब वह है जिसमें गाँठ नहीं निकलती। गाँठवाला वह मरीज भी जिसकी बगल में गाँठ हो, ज्यादा खतरनाक है। तीसरी किसिम की ताऊन अकसर आराम हो जाती है। गाँठ पककर फूट जाना आराम होने की निशानी है। बदन पर खून के बिन्ते या दहोरे पड़ जाना बहुत खराब हैं। मुँह, नाक, दस्त और पेशाब के रास्ते खून गिरना भी इसी तरह खतरनाक है। गाँठ का बैठ जाना भी बुरा चिन्ह है। ताऊन का बीमार कुछ घण्टों से लेकर एक महीने तक जिन्दा रह सकता है। कभी-कभी चौबीस घण्टे के अन्दर, कभी दूसरे या तीसरे दिन, और कभी-कभी पाँचवे-छठे और सातवें दिन मरीज मर जाता है। बीमारी ज्यों-ज्यों पुरानी होती है बीमार के बचने की आशा होती जाती है।

पेट में जो कंठुए पड़ जाते हैं, वे लम्बे और गोल होते हैं, इनका छोर तुकौला होता है। ये ४ से ६ इञ्च तक लम्बे होने हैं।

ये छोटी आँतों में होते हैं; पर मेदे में भी जा सकते हैं। कभी-कभी जब उल्टी होती है वे गले तक चढ़ आते हैं। खास-नाली में चले आने से बालक का दम घुटकर मर जाने का बड़ा अन्देशा रहता है। जब बालक के पेट में कंठुए हो जाते हैं तो उसकी भूख बन्द हो जाती है और उसका जी मिचलाने लगता है, कभी-कभी पेट में दर्द भी होने

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कीड़ों की बीमारियाँ

लगता है। बालक नाक मलता है और दांत कट-कटाता है।

जब यह मालूम होजाय कि किसी बालक के पेट में केंचुएँ हैं तो दोपहर को उसे परएडी का तेल पिलादो, उसी दिन शाम को आधा ग्रैन सेन्टोनीन थोड़ी चीनी मिलाकर पिलादो। दूसरे दिन सुबह और फिर शाम को भी आधा-आधा ग्रैन सेन्टोनीन दो। इसके दो घण्टे बाद परएडी का तेल पिलाओ। इन दो दिनों में उसे कुछ तरकारी खाने को मत दो, सिर्फ चावल का माण्ड दो। सेन्टोनीन अंग्रेजी दवा है, वह बाल-बच्चे दारों को अपने घर में हरवक्त बनाए रखनी चाहिए। बच्चों के पेट में एकाध केंचुएँ होना हर हालत में मुश्किल है, ऐसी हालत में साल में एक बार सेन्टोनीन दे देना ही अच्छा है। क्योंकि ज्यादा केंचुएँ होने से तो पता चल जाता है पर थोड़ी केंचुएँ होने से न उल्टी होती है न दस्त होते हैं। ये केंचुएँ चुपचाप खुराक के रस को चूसते रहते हैं जिससे बालक की बढ़ती रुक जाती है। परन्तु यदि रखो कि सेन्टोनीन ज़हर है, उसे ज्यादा मत दो, उसके देने से पेशाब पीला होजाता है और पीला ही दीखने लगता है, पर इससे डरने की बात नहीं, एक-दो दिन में यह बात जाती रहती है।

पेट के केंचुएँ पेट में नहीं पैदा होते, खुराक और पानी के साथ इनके अण्डे पेट में जाते हैं। आँतों के ये कीड़े अनगिनत अण्डे देते हैं, और ये अण्डे दस्त के रास्ते बाहर निकलते हैं, और ज़मीन में, नदी या तालाब के पानी में, या बगीचों की हरियाली में अपनी जगह बना लेते हैं। इनमें बच्चे के लिए यह बहुत

सुगम त्रिकिंसा-

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ज़रूरी है कि उवाला हुच्चा पानी काम में लाया जाय। सड़ी तर-कारी जो बाज़ार से मौल ली जाय उसे पकाकर खाया जाय, फलों को खाने से पहले गर्म पानी में थोकर छील लेना चाहिए। बच्चों को मुँह में उँगली नहीं डालने देनी चाहिए; न अष्ट-सष्ट चीज़ों की मुँह में रखने की आदत पड़ने देनी चाहिए। इस किसम के कीड़ों के अण्डे कुत्तों और विल्लियों की आँतों में भी होते हैं, जब वे बालक के हाथों को चाटते हैं तो ये कीड़े उनके हाथ में लग जाते हैं, फिर बालक उँगलियों को मुँह में डालकर या उन्हीं हाथों से खाना खाकर उन कीड़ों को मुँह में डाल लेता है।

दस आदमियों में से चार को कद्दूदाने की बीमारी होती है। जिनके पेट में ये कीड़े होते हैं वे बहुत सुस्त और ठीले-ढाले रहते

कद्दूदाने हैं। कद्दूदाना एक सफेद गोलाकार लम्बा और बारीक कीड़ा है। वह तिहाई इच्छ से आध इच्छ

तक लम्बा और सीने के धागे के जैसा मोटा होता है। अगर सीने के मामूली धागे को आध इच्छ के छोटे-छोटे टुकड़ों में काट डाला जावे तो वे कद्दूदाने के जैसे दीख पड़ेंगे। ये छोटे कीड़े बच्चों और बड़ों दोनों के जिसम में घुस जाते हैं। कभी-कभी वे गिनती में बहुत कम, यानी १०-२० ही होते हैं, पर कभी-कभी उनकी गिनती हजारों तक पहुँच जाती है। वे कीड़े आँत की भीतरी परत में चिपक जाते हैं और खून को चूसने लगते हैं। वे सिर्फ़ खून ही को नहीं चूसते वहाँ घाव भी बना देते हैं जिनसे खून रिस्ता रहता है। इस तरह लगातार खून रिसने रहने से और इस जहर से जो

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कीड़ों की बीमारियाँ

इन कीड़ों से पैदा होता है आदमी दुबला और पीक पड़ जाता है, ताकत कम हो जाती है और तपेदिक होने का खतरा हो जाता है। बच्चे, जिनके पेट में कद्दूदाने होते हैं, छोटे ही रहते हैं और उनकी बढ़ावार रुक जाती है, वे १८ वीस वर्ष की उम्र में १०-१२ वर्ष के बालक से लगते हैं।

अगर तुम यह देखो कि किसी बालक की चमड़ी पीली पड़ गई है, वह सुस्त हो गया है और उसे चूना या मिट्टी रखने की इच्छा होती है तो जान लो कि इसके पेट में कद्दूदाने की बीमारी है। पाँव के तलुए और अँगूठों के बीच में खुजली चलने से यह समझना चाहिए कि कद्दूदाने पैर की चमड़ी के जरिये शरीर में घुस रहे हैं।

ये कद्दूदाने पेट में अनगिनत अण्डे देते हैं, पाखाने के साथ ये बाहर निकलते हैं, जब पाखाना इधर-उधर फँक दिया जाता है, तो ये भी फैल जाते हैं, १० दिन में इनमें से कीड़े निकल आते हैं, और घर के आँगन या बगीचे की मिट्टी में रेंगने लगते हैं। जो आदमी या बच्चे नंगे पैर चलते हैं उनके पैरों पर चढ़ जाते हैं और सौका पाकर चमड़ी में छेद करके भीतर घुस जाते हैं। और आँतों तक पहुँच जाते हैं। वहाँ मजे में खून चूसते रहते हैं।

इनके रोकने की सबसे अच्छी तरकीब यह है कि पक्के पाखानों को काम में लाया जाय, इधर-उधर मैला न फँका जाय। टह्रियों में ढकनेदार बालटियाँ हों, पाखाना दूर ले जाया जाय या गाड़ दिया जाय। अगर घर में पक्का पाखाना नहीं है तो

सुगम चिकित्सा

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यह तरकीब करो कि एक गढ़ा खोदो। उसपर लकड़ी का एक बक्स उल्टा ढक दो—उसके पीछे में एक छेद कर दो। छेद पर एक तरखा ढक दो। सन्दूक के ऊपर मिट्टी चढ़ा दो और उसे पाखाने के लिए काम में लो। कुछ दिन बाद बक्स दूसरी जगह बदल दो और पहले गढ़े को भर दो। कददूदाने मिट्टी में ६ महीने तक बने रह सकते हैं। इसलिए खेतों में और बगीचों में नंगे पैर हरगिज मत जाओ। न कभी तरकारी खाओ और न कच्चा पानी पियो। बालकों को नंगा मत रखो। ज्योंही किसी बालक या बच्चे आदमी के पेट में कददूदाने का शक हो तो उसे फौरन डाक्टर को दिखाओ।

ये बहुत छोटे कीड़े बच्चों के पाखाने की जगह होते हैं, इनसे उस जगह बड़ी खुजली चलती है, और जलन होती है, लड़कियों के पेशाब की जगह तक ये फैल जाते हैं। ऐसे चूर्न बच्चों की खुराक पर सबसे पहले ध्यान दो, ज्यादा मत खाने दो। पहले गरण्डी के तेल का एक जुलाव दो, फिर नमक के पानी की पिचकारी दे दो। वैसलीन या गोले का तेल गुदा पर चुपड़ दो। इस पर आराम न हो तो किसी डाक्टर से सलाह लो। बच्चों के पाखाने की जगह को साफ रखो।

: ११ :

चमड़ी की बीमारियाँ

बरसात के मौसम में सैकड़ों क्रिस्म के कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाते हैं, उनमें कुछ इतने छोटे होते हैं जो आँखों से देखे ही नहीं जा सकते। वे कीड़े खाने-पीने की चीजों पर खुजली चढ़कर हमारे जिस्म पर पहुँच जाते हैं और चमड़ी में छेद करके कई चमड़ी की बीमारियाँ पैदा कर देते हैं। आजकल चमड़ी की जो बीमारियाँ पैदा होती हैं, उनमें खाज सब से बढ़कर है। खुजली के कीड़े पहले उँगलियों के बीच में कलाई की जड़ में या छाती और नाक के पास फुन्सियाँ पैदा करते हैं। इसमें पहले खुजली होती है, फिर खुजाने से छाले-फुन्सी और लाल चकत्ते पड़ जाते हैं। यह बीमारी बड़ी छूत की है और यह छूत दूसरे को लग जाती है। इसलिए इस बात का पूरा ख्याल रखो कि जिस आदमी को खुजली की बीमारी हो रही हो उसको छूओ मत, न उसके पलंग-बिस्तर पर बैठो, न उसका भूठा खाना-पीना खाओ-पियो। उसका भूठा ढुका भी मत पियो।

सुगम चिकित्सा

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इस बीमारों का इलाज यह है कि पहले गर्म पानी में नीम की पत्तियाँ उबालकर उससे बदन को खूब मलकर साफ कर लो, पत्तियाँ न उबाल सको तो सावन से नहा लो, इसके बाद गन्धक आँवलासार तीन हिस्सा और नारियल का तेल एक हिस्सा लेकर खूब मिलाकर मलहम बना लो। यह मलहम तीन दिन तक रोज सुबह-शाम खुजलीवाली जगहों पर खूब मलो। तीन दिन तक न कपड़े बदलो, न बिछोना बदलो। तीन दिन बाद गर्म-पानी, सावुन से खूब मल-मल कर नहा डालो। जो बिछोना इस बीच में काम में लो उसे गर्म-पानी में उबालकर धोवी को दो।

बरसात के दिनों में काले और लाल मुंहवाली फुंसियाँ चहरे, कन्धों और पीठ पर अक्सर हो जाती हैं। ऐसे लोगों को कि जिन्हें

फुंसियाँ फुंसियाँ हो जायँ, मिठाइयाँ, पकवान, तम्बाकू, शराब, तेल और मिर्च-मसाले की चीजें खाना

छोड़ देना चाहिए। ठंडा पानी खूब पीना चाहिए। अगर पानी में नींबू तिचोड़ दिया जाय तो और भी अच्छा हो। नहाने के बाद, मोटे तौलिया से फुंसियों को रगड़ के मलना चाहिए। पेट साफ रखना बहुत जरूरी है। और कुछ न हो तो सनाय और नमक का चूर्न बनाकर रात को सोते वक्त गरम पानी से खा लेना चाहिए। फुंसियों के लिए यह भरहम बड़े काम का है —नीम की पत्तियों को घी में जला लो और फिर उस घी में बराबर मोम मिला लो, फुंसियों के मुंह को सूई की नोक से खोल सकते हो, मगर सूई के नोक को आग पर गर्म कर लेना चाहिए।

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चमड़ी की बीमारियाँ

अम्होरियाँ भी इस मौसम में बड़ी तकलीफ देती हैं। ये पसीने निकलने से पैदा होती हैं। इसके आराम करने की तरकीब यह है कि चमड़ी को ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर पोछो और फिर उस पर गेहूँ का मैदा छिड़क दो इससे बहुत फायदा होगा।

दाद की बीमारी आमतौर से रानों के जोड़ पर और जिसमें दूसरे हिस्से पर भी बहुत आदमियों को होती है और बरसात

में वह ज्यादा तकलीफ देती है। जिन लोगों को दाद होती है उनके कपड़े इस्तैमाल करने से

दूसरों को भी दाद हो जाता है। बाजार में दाद की बहुत-सी दवाई मिलती हैं, सबसे अच्छी दवा कैम्पकम्पनी का दाद का मलहम है जो बाजार में सब जगह मिलता है। दूसरी दवा—“गंधक, सुहागा, कल्या, तीनों चीज बराबर और सब का बारहवाँ हिस्सा तूतिया, इनको नींबू के रस में घोटकर गोली बना ली जाय और वह गोली घिसकर दाद पर मलदी जाय तो दाद को आराम हो जाता है।

चर्बों के सिर पर जब दाद हो जाती है तो उससे थाल सफेद भी हो जाते हैं और भड़ जाते हैं। यह दाद बड़ी मुश्किल से आराम होती है। वालों को मुँडवाकर दवा लगानी चाहिए।

अगर जल्द आराम न हो तो जल्द किसी अच्छे डाक्टर को दिखाना चाहिए। नहीं तो बीमारी बढ़ जायगी और बालक गंजा हो जायगा।

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एकजैमा बड़ी खराब बीमारी है, इससे चमड़ी पर चकत्ते होजाते हैं और खुजाने से उसमें पानी निकलने एकजैमा लगता है, पीछे पपड़ी पड़ जाती है और कभी-

कभी चमड़ी फट जाती है।

एकजैमा चेहरे पर, खोपड़ी पर, और जोड़ों के पास चमड़ी के तहों पर होता है। इसका इलाज बहुत ही मुश्किल है। किसी अच्छे डाक्टर से इलाज कराना चाहिए। शराब, तम्बाकू और मांस खाना छोड़ देना चाहिए। पेट को साफ रखने, फल खूब खाओ और पानी में नींबू का रस मिलाकर पीओ। साबुन और पानी उस जगह को मत छूने दो। पपड़ी को हटाने के लिए नारि- यल का तेल चुपड़ दिया करो।

जो बच्चे अक्सर लापरवाही से धूल-गर्द में खेलते रहते हैं, उनके जिस्म पर फोड़े-फुन्सी अक्सर होजाते हैं। जिन बालकों को फोड़े-फुन्सियाँ निकल रहे हों, उन्हें मच्छर और मकड़ी से सुरक्षित रखो। अगर उनकी खाल पर खरोंच लग गई है या खोंच लग गई है तो उस जगह को फौन धोकर और सुखाकर टिचर- आइडिन लगा दो, मगर घाव से पानी-जैसा निकलता हो, तो टिचर-आइडिन मत लगाओ। बोरिक पाउडर छिड़क दो और पट्टी बाँध दो। इससे वह हिस्सा पकेगा नहीं। टिचर-आइडिन और बोरिक एसिड ये बहुत मामूली दवाइयाँ हैं और बहुत सस्ती बाजार में मिल सकती हैं। ये दवाइयाँ हमेशा घर में रखनी चाहिए।

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चमड़ी की बीमारियाँ

अगर चोट लगकर चमड़ी कट जाय और घाव खुल जाय तो यह तरकीब करो कि एक गिलास ठण्डे पानी में एक बड़ा चम्मच नमक मिला दो। उस पानी में कपड़ा तर करके दो-तीन तह बनाकर घाव पर रख दो और उसके ऊपर एक माफ कागज तेल या घी में चुपड़कर रख दो और पट्टी बाँध दो, ये पट्टी हर घण्टे तर करके रखो। इससे घाव बहुत जल्द पुर जायगा।

चेचक की बीमारी उड़कर बहुत जल्दी लगती है। अगर हम इसके रोगी से बचकर नहीं रहें तो पचास कीसदी हमें बीमार

होने और मर जाने का डर है। यह रोग सबसे

आसानी से फैल जाता है। रोगी बहुत कष्ट

पाता है, जो इससे आराम होकर बच जाते हैं, उनके जिसमें भड़े और चेहरा दाग-दशीला होजाता है। दुनिया में जितने ग्रंथे दोख पड़ते हैं, उनमें से ज्यादातर इसीकी बर्दीलत हैं।

चेचक का जहर खून में, उसके दानों में, दानों की पपड़ी में, मांस में, और पसीने में होता है। इन्होंने जरिये वह एक से दूसरे आदमी में फैलता है। इसका असर देर तक रहता है। रोगी के कपड़ों में भी इसका जहर रम जाता है, इसलिये उसके काम में आड़े हुड़े चीजों, कपड़ों, चारपाइयों और मकान को बिना धोये और दवाई के पानी से साफ किये कभी काम में नहीं लाना चाहिए।

जिस आदमी को चेचक का असर होता है वह शुरू दिनों में मुस्त रहता है। फिर सदी लगकर बुखार चढ़ता है। बुखार १०४

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डिग्री तक चढ़ जाता है—बड़ी भारी बेचैनी होजाती है। तमाम बदन में और खासकर पीठ और पेट में बहुत दर्द रहता है। जी मिचलाता है, गला सूज जाता है, और जुकाम की शिकायत होजाती है।

तीसरे या चौथे दिन दाने दीख पड़ते हैं। ये दाने पहले माथे और मुँह पर नजर आते हैं, इसके बाद ही एक-दो दिन में छाती, पेट और बाकी हिस्सों में भी नजर आते हैं। शुरु-शुरु में ये बहुत बारीक और लाल रंग के होते हैं—फिर ये धीरे-धीरे ऊपर को उभरते हैं और बड़े होते जाते हैं। छूने से बहुत सख्त जान पड़ते हैं। दूसरे या तीसरे दिन उनमें पानी भर जाता है। पाँचवें दिन उनके बीच में गढ़ा पड़ जाता है और उसके आस-पास लाल चक्कर-सा मालूम देता है। इसके बाद उनमें मवाद होने लगता है और दाने फफोले की शकल में हो जाते हैं। एक-दो दिन में ये फफोले फूट जाते हैं और खुरएड बँध जाता है—या वे काले पड़ जाते हैं। फिर वे धीरे-धीरे सूखने लगते हैं। दाने के ऊपर का खुरएड ४-५ दिन में उतर पड़ता है और उसकी जगह लाल चट्टा रह जाता है। अगर दाने का असर खाल में तहतक घुस गया हो तो यह दाग हमेशा के लिए रह जाता है।

कभी-कभी आँखों पर जहर चढ़ जाता है और वे सूज जाती हैं और वहाँ भी दाने नजर आते हैं। इसीसे आखीर में आँखों में फूला पड़ जाता है, पुतली बाहर निकल पड़ती है या वे बिल्कुल ही जाती रहती हैं।

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चमड़ी की बीमारियाँ

यह देखा गया है कि चर्बों और चूड़ों पर इसका ज्यादा जोर होता है। दाने ज्यादा निकलने से, तेज बुखार आने से, फेफड़ों पर सूजन आने से रोगी की न से १३ दिन के भीतर खतरनाक हालत हो जाती है और वह मर जाता है। जवान आदमी बहुत कम मरते हैं—लेकिन गर्भवती स्त्रियों के बच्चे जीज जाते हैं। इस रोग में वृद्ध से बहुत बढ़ाव आती है।

इससे बचने की सबसे अच्छी तरकीब टीका लगवाना है। सन् १७६८ ईस्वी में डाक्टर एडवर्ड जेनर ने सबसे पहले इस तरकीब को ढूँढ़ निकाला। इस खोज से चेचक के हमले का डर जाता रहा। जिस देश में चेचक का टीका लगाने का रिवाज है वहाँ कोई ही इस रोग की चपेट में आता है और अगर आ भी गया तो उसका फौरन इलाज हो जाता है।

टीका लगवाने में जरा भी तकलीफ नहीं होती। आजकल बहुत होशियारी से टीका लगाया जाता है। वहाँ में नश्तर से तीन या चार निशान करके ग्लेसरीन में दवा मिलाकर लगा देते हैं। अगर इन सब बातों का ध्यान रखा जाय तो किसी बात का भी आदेश नहीं रहता। बचा अगर तन्दुरुस्त है तो उसपर कुछ भी घुरा असर नहीं पड़ेगा। टीका लगाने के तीन दिन बाद उस जगह फुसियाँ निकली हुई मालूम देती हैं जो बाद में लाल होती जाती हैं। इसके बाद ही इनके भीतर साफ पानी मालूम पड़ने लगता है। इनकी शक़ल फफोलों की तरह हो जाती है जो आठवें दिन पक जाते हैं। पानी का पीब बनता है। वह सूख जाता है, और

सुगम विक्रिता

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खुरएड जम जाता है । क़रीब-क़रीब तीसरे हफ़्ते में वह सूखकर छूट जाता है और टीके का निशान वोह पर बना रहता है । इस बात का खयाल रखना चाहिए कि खुरएड को कभी खुजाना नहीं और अपने हाथ से उखाड़ना भी नहीं । उसमें धूल-मिट्टी नहीं लगनी चाहिए, न भटका लगना चाहिए ।

यह टीका इतना सहल और मामूली है कि हम यह कभी नहीं सोच सकते कि इसके लिए कितनी भारी खोज की गई होगी । इस टीके के बारे में खोज करने के लिए जो बड़े-बड़े डाक्टरों का रॉयल कमीशन बैठा था उसने जाँच करके यह बताया था कि इस सीधीसादी तरकीब से चेचक का बहुत-कुछ बचाव होता है । अगर चेचक निकलती भी है तो ज़हर बहुत-कम असर करता है । आदमी कम मरते हैं । रोगी को तकलीफ़ भी बहुत-कम होती है ।

पहले लोगों का यह खयाल था कि बचपन में टीका लगवाने से जन्म-भर के लिए चेचक का डर नहीं रहता । लेकिन फिर यह देखा गया कि अगर १२ बरस की उम्र में फिर एक बार टीका लगा दिया जाय तो चेचक कभी नहीं निकल सकती ।

बच्चों को तीन हफ़्ते की उम्र होने के बाद तीन महीने की उम्र के भीतर-भीतर टीका लगवा देना चाहिए । दुबारा ज़रूरत हो तो १२ बरस की उम्र में लगवाया जाय ।

अगर किसी बच्चे या बड़े आदमी के चेचक निकल भी आवे तो इन बातों की संभाल रखो:—

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चमड़ी की बीमारियाँ

१—रोगी का कमरा खूब साफ और खूशबूदार हो। किवाड़ों और खिड़कियों पर नीम की हरी डालियाँ लगा दी जायँ।

२—कोई मैला आदमी रोगी के पास न जाय। उसे आराम से सोने दो।

३—मूँठे या गंदे हाथों से रोगी को न छुआ जाय।

४—छालों से पीब या पानी बहता हो तो यह करे कि पट्टी के कपड़े को टपड़े पानी में जिसमें २ प्रतिशत कारबोलिक एसिड मिला हो, भिगोकर रोगी के चेहरे और हाथों पर धरावर लगाते रहो। जब दाने सूखने लगें और पपड़ी पड़ने लगे तो उनपर वार-बार बेसलीन लगाओ। अगर देहात में यह इलाज नहीं हो सके तो सफेद कल्था वारीक पीसकर पीब भरे दानों पर घुस्कते रहो। या झरने उपलों की छनी हुई राख घुस्क दो। या विछौन पर विछा दो, पर वह रोज बदल दी जाय।

५—बच्चों को कभी भी दानों को मत खजाने दो—नहीं तो दानों में गढ़े पड़ जायेंगे।

६—आँखों की संभाल खास्तौर पर रखो। बोरिक लोशन में कपड़े का एक टुकड़ा भिगोकर थोड़ी-थोड़ी देर में पलकों को धो दिया करो। आँख के पोटे को धो और सुखाकर पलकों के किनारे थोड़ा-सा बेसलीन लगा दो। तीन-तीन घण्टे में बोरिक लोशन की बूँदें आँखों में डालते रहो।

अब हम थोड़ा इलाज भी बताते हैं—

१—शुक्र में बनगोभी १॥ माशा, कालीमिर्च ५ दाने घोट-पीस

सुगम चिकित्सा

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कर दो तोले जल में दो-तीन बार पिलाओ। यह ख़ुराक ३-४ वर्ष के बच्चे के लिए है। छोटे बच्चे के लिए इसी हिस्सा से घट बढ़ कर लेना चाहिए।

२—अगर चेचक ख़ूब निकल आई हो तो घिसा हुआ चन्दन ३ मासो, हलहुल का रस ६ मासो, पानी २ तोला घोलकर थोड़ा-थोड़ा दिन भर में दो-तीन बार पिलावे।

३—अगर रोगी को गर्मी और बेचैनी बहुत हो तो सफेद चन्दन, अडूसा, मोथा, गिलोय, और मुतका सब बराबर-बराबर दो-दो तोला ले शक़ोरे में रात को एक पाव पानी में भिगो दो। सुबह मल-छान मिश्री मिलाकर पिला दो।

४—पीने के लिए पीपलकण्ठी का पानी और खाने को मूँग की घुली हुई दाल, परबल, लौकी, पालक बगैरा दें। थोड़ा-सा सेंधा नमक डालें।

पीपल की सूखी छाल को जलाकर जब वह निर्धूम अंगार हो जाय—तब मिट्टी की कोरी हंडिया में जल भरकर उसमें उसे बुझादो। फिर निथार कर वह पानी पिलाया जाय—यही पीपलकण्ठी का पानी है।

मोतीभरा देहातों और कस्बों में आमतौर पर फैला रहता है। बोल-चाल में डाक्टर लोग इसे मियादी बुझार कहते हैं। यह

बुझार आमतौर पर तीन हफ़्ते तक रहता है, पर कभी-कभी सात-से दस दिन तक भी रहता है। बुझार के लगातार बने रहने से लोग घबरा जाते हैं; बहुत लोग

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चमड़ी की बीमारियाँ

देवता की मानता करते हैं—परन्तु यदि ठीक तौर से मरीज की सम्हाल की जाय तो ठीक बन्फ पर मोतीभरा आप ही आराम हो जाता है।

यह बुखार एक खास तरह के कीड़ों से होता है, जो आँतड़ियों में हो जाते हैं। शुरू में सिरदर्द, बेचैनी, सुस्ती और तमाम बदन में दर्द होता है, अक्सर शुरू में जाड़ा देकर बुखार बढ़ता है, शुरू-शुरू में सुबह के बन्फ १०५ डिग्री बुखार प्रायः रहता है। शाम को १०३ या १०४ तक पहुँच जाता है। नक्ज की चाल ८०-६० फी मिनट हो जाती है। अक्सर यह होता है कि एक-दो दिन बाद बुखार कम हो जाता है, और रोगी काम-धन्धा करने लगता है।

तीन-चार दिन बाद बुखार १०३ डिग्री रहने लगता है, सिर में सख्त दर्द रहता है, जीभ पर सफेद तह जम जाती है, भूख नहीं लगती कुछ खाओ तो कँ हो जाती है, पेट कुछ फूला रहता है और दुखता है, या तो कंठज हो जाता है या दस्त आने लगते हैं। बीमार आदमी बड़ी देर तक सोता रहता है।

दूसरे हफ्ते में बुखार कुछ तेज हो जाता है, पिसू के काटने की तरह लाल-लाल धब्बे पेट पर पड़ जाते हैं, हाँठ और जीभ पर गहरे भूरे रङ्ग की पपड़ी जम जाती है, किसी-किसी बीमार की आँतों में जखम हो जाते हैं तो दस्त की राह खून आता है, इस से मरीज के पाखाने का रङ्ग गुलाबी-सा हो जाता है। अगर आँतों में से खून ज्यादा निकल जाय तो मरीज के मर जाने का भी शंका होता है। कभी-कभी मरीज को मरसाम भी हो जाता है।

सुगम चिकित्सा

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तीसरे हफ्ते बुखार घटने लगता है, और बुखार चढ़ने के २१ वें दिन अपने-आप ही बुखार उत्तर जाता है। आँतों में छेद हो जाने और उनसे खून बहने लगने का डर बीमारी के तीसरे हफ्ते में ज्यादा रहता है।

मोतीभर्रा के इलाज में दवा की बहुत कम जरूरत पड़ती है, सबसे जरूरी बात तो रोगी की सफाई, सेवा-टहल और खाने-पीने का ठीक-ठीक बन्दोबस्त करना है। यहाँ किसी रोगी को मोती-भर्रा का शक हो तो घरवालों को चाहिए की उसे तुरन्त पलङ्ग पर एक हवादार साफ कमरे में लिटा दें और किसी अच्छे डाक्टर को दिखावेँ जिससे वह मरीज के खून की जाँच करके बता सके कि सच-मुच मोतीभर्रा ही है।

मरीज के खाने-पीने के लिए पतली चीजें दी जानी चाहिए। गाय का ताज़ा उबाला हुआ दूध रोगी के लिए सब से बढ़िया खुराक है। गोश्त खानेवाले शोरुआ भी ले सकते हैं। पतली खिचड़ी, चावल का माख दूध में पानी मिलाकर साबूदाने की खीर डबल रोटी दूध भुना हुआ आलू, तोरई, टिण्डा, परबल, टमाटर का जूस मरीज के लिए बहुत अच्छी खुराक है। अगर याद रखो की मरीज को एक ही बार में बहुत-सा खाना मत दो। एक साफ सुराही में उबाल-छानकर पानी रोगी के पास रखो और उसे मन चाहे जितना पीने को दो। मोतीभर्रा का मरीज जितना पानी पीवेगा उतना ही उसे फायदा होगा।

मोतीभर्रा के बीमार का गँह खासतौर पर साफ करना चाहिए।

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चमड़ी की बीमारियाँ

दॉत और जीभ को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। एक छोटा चमत्क पिसा हुआ नमक और इतना ही खाने का लोड़ा एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर उससे सुवह-शाम मरीज को कूला कराने से जीभ और दॉत बहुत अच्छी तरह साफ हो जाते हैं।

पेट में ज्यादा दर्द हो तो पेट को गर्म पानी में तैलिया भिगोकर और निचोड़ कर सेकना चाहिए। कच्चा होने पर गर्म पानी का ऐनीमा, और दस्त आने पर स्तार्च की पिचकारी देना चाहिए। इसके देने की रीति यह है कि तीन-चार छोटे चमत्के मैदा लो, और उसे ठण्डे पानी में खूब घोल लो, तब गिलास-भर पानी उसमें और मिलाओ, और उबाल डालो। ठण्डा होने पर ऐनीमा की राति से पेट में पहुँचा दो। पर याद रहे यह घोल खूब पतला होजाय। जरूरत होने पर यह पिचकारी हर दूसरे दिन दी जा सकती है।

अगर बुखार बहुत तेज हो तो मरीज को ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर पोंछ दो। यह काम १५-२० मिनट तक किया जा सकता है। गीले कपड़े को रोगी के शरीर पर फेरकर फिर सूखे कपड़े से उसे मत पोंछो। पंखे से हवा करके शरीर को सुखाओ। इससे मरीज की बेचैनी, गर्मी और घबराहट दूर होगी, उसे चैन पड़ेगा। अगर बुखार कालू में न आये तो दिन में दो-तीन बार भी यह काम किया जा सकता है। इसमें सर्दी लगने का कोई डर नहीं है। तेज बुखार में या सरसाम की हालत में मरीज के सिर पर बर्फ रखना जा सकता है। सिर दर्द बहुत तेज होने पर भी बर्फ रख सकते हैं। बर्फ न मिले तो ठण्डे पानी में कपड़ा तर करके

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रख सकते हैं। यह कपड़ा पाँच-चार मिनट में बदलते रहना चाहिए।

दस्त के रास्ते अगर खून दिखाई दे तो १०-१२ घण्टों तक कुछ भी खाना मत दो। वर्क मिल सके तो छोटे-छोटे टुकड़े करके कपड़े में लपेटकर पेट पर रख दो, इससे खून बहना रुक जायगा।

बुखार उत्तर जाने पर, मरीज को कड़ाके की भूख लगती है। खबरदार रहो कि उसे कोई कड़ी चीज न दी जाय। पतला और नर्म ही खाना देना चाहिए।

याद रखो कि मरीज के थूक, पेशाब और पाखाने में बीमारी के कीड़े होते हैं। इसलिए इन चीजों को योंही मत फेंक दो, चरना हवा में मिलकर ये कीड़े बीमारी फैलावेंगे। मरीज को साफ कागज या बिथड़ों पर शुक्वा दो, फिर उन्हें जला दो।

मरीज के इस्तैमाल करने के कपड़े-वर्तन अलग रखो और जो खाना मरीज से बच जाय, उसे तन्दुरुस्त आदमी को मत दो। जो लोग, मरीज की सेवा-टहल में लगे हों, वे रसोई-घर में न जाने पावें। तीलिये और रूमाल जिन्हें मरीज अपने काम में लावे, उबाल डाले जायें।

मरीज के अच्छे हो जाने पर जो कपड़े धुल सकते हैं, पानी में उबाल डालने चाहिए। कमरे में चूना पुतवाना चाहिए। गढ़ा हो सके तो जला डालना चाहिए।

हमेशा याद रखो कि मोतीभरों के कीड़े मुँह के रास्ते पेट में जाते हैं। अक्सर ये पानी या खाने की चीजों में होते हैं। लोग

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चमड़ी की बीमारियाँ

मल-मूत्र को ऐसी लापरवाही से फेंक देते हैं कि वह कुखों-तालावों और नालों में चला जाता है। उस पानी को पीने से मोतीफ़रा हो जाता है। गाय-भैंस के दूध में भी बहुत करके ये कीड़े होते हैं। इसलिए दूध और पानी भी ऐसे दिनों में उबाल-कर पीना चाहिए। सख्ती-तरकारी में जो मैले का खाद डाला जाता है, उसमें जो रोग के कीड़े होते हैं, वे तरकारी-साग में चिपक जाते हैं। भक्षिष्यों भी मोतीफ़रा फैलाने में बहुत मदद देती हैं, इन्हें रसोई-घर से दूर रखने के लिए हमेशा खिड़कियों और दरवाजों पर जाली लगवाड़ी और भोजन को कभी उघाड़ा मत छोड़ो।

हाल ही में मोतीफ़रा का टीका लगने की रीति चली है। जो लोग ऐसी जगह में रहते हैं, जहाँ मोतीफ़रे का जोर हो या जिन्हें सफ़र करना पड़े, उनके लिए यह टीका मुफ़ीद है। इसके लगाने से दो-तीन साल तक मोतीफ़रे का डर नहीं रहता।

देहातों में इसे फसली बुखार कहते हैं और कुख्यार-कार्तिक के महीनों में लोग इससे गाँवों में भारी कष्ट पाते हैं। इस रोग में हर साल हजारों आदमी मरते हैं। यह रोग मच्छर मलेरिया के काटने से लगता है। मलेरिया का मच्छर मामूली मच्छर की बनिस्बत अजीब-सा होता है। उसके बैठने की धज भी अलग होती है। जब यह मच्छर किसी को काटता है तो बीमारी के कीड़े आदमी के खून में छोड़ देता है। वे वहाँ लाखों हो जाते हैं, और आदमी बीमार हो जाता है।