सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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चमड़ी की बीमारियाँ
मल-मूत्र को ऐसी लापरवाही से फेंक देते हैं कि वह कुखों-तालावों और नालों में चला जाता है। उस पानी को पीने से मोतीफ़रा हो जाता है। गाय-भैंस के दूध में भी बहुत करके ये कीड़े होते हैं। इसलिए दूध और पानी भी ऐसे दिनों में उबाल-कर पीना चाहिए। सख्ती-तरकारी में जो मैले का खाद डाला जाता है, उसमें जो रोग के कीड़े होते हैं, वे तरकारी-साग में चिपक जाते हैं। भक्षिष्यों भी मोतीफ़रा फैलाने में बहुत मदद देती हैं, इन्हें रसोई-घर से दूर रखने के लिए हमेशा खिड़कियों और दरवाजों पर जाली लगवाड़ी और भोजन को कभी उघाड़ा मत छोड़ो।
हाल ही में मोतीफ़रा का टीका लगने की रीति चली है। जो लोग ऐसी जगह में रहते हैं, जहाँ मोतीफ़रे का जोर हो या जिन्हें सफ़र करना पड़े, उनके लिए यह टीका मुफ़ीद है। इसके लगाने से दो-तीन साल तक मोतीफ़रे का डर नहीं रहता।
देहातों में इसे फसली बुखार कहते हैं और कुख्यार-कार्तिक के महीनों में लोग इससे गाँवों में भारी कष्ट पाते हैं। इस रोग में हर साल हजारों आदमी मरते हैं। यह रोग मच्छर मलेरिया के काटने से लगता है। मलेरिया का मच्छर मामूली मच्छर की बनिस्बत अजीब-सा होता है। उसके बैठने की धज भी अलग होती है। जब यह मच्छर किसी को काटता है तो बीमारी के कीड़े आदमी के खून में छोड़ देता है। वे वहाँ लाखों हो जाते हैं, और आदमी बीमार हो जाता है।