सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ें७५
चमड़ी की बीमारियाँ
देवता की मानता करते हैं—परन्तु यदि ठीक तौर से मरीज की सम्हाल की जाय तो ठीक बन्फ पर मोतीभरा आप ही आराम हो जाता है।
यह बुखार एक खास तरह के कीड़ों से होता है, जो आँतड़ियों में हो जाते हैं। शुरू में सिरदर्द, बेचैनी, सुस्ती और तमाम बदन में दर्द होता है, अक्सर शुरू में जाड़ा देकर बुखार बढ़ता है, शुरू-शुरू में सुबह के बन्फ १०५ डिग्री बुखार प्रायः रहता है। शाम को १०३ या १०४ तक पहुँच जाता है। नक्ज की चाल ८०-६० फी मिनट हो जाती है। अक्सर यह होता है कि एक-दो दिन बाद बुखार कम हो जाता है, और रोगी काम-धन्धा करने लगता है।
तीन-चार दिन बाद बुखार १०३ डिग्री रहने लगता है, सिर में सख्त दर्द रहता है, जीभ पर सफेद तह जम जाती है, भूख नहीं लगती कुछ खाओ तो कँ हो जाती है, पेट कुछ फूला रहता है और दुखता है, या तो कंठज हो जाता है या दस्त आने लगते हैं। बीमार आदमी बड़ी देर तक सोता रहता है।
दूसरे हफ्ते में बुखार कुछ तेज हो जाता है, पिसू के काटने की तरह लाल-लाल धब्बे पेट पर पड़ जाते हैं, हाँठ और जीभ पर गहरे भूरे रङ्ग की पपड़ी जम जाती है, किसी-किसी बीमार की आँतों में जखम हो जाते हैं तो दस्त की राह खून आता है, इस से मरीज के पाखाने का रङ्ग गुलाबी-सा हो जाता है। अगर आँतों में से खून ज्यादा निकल जाय तो मरीज के मर जाने का भी शंका होता है। कभी-कभी मरीज को मरसाम भी हो जाता है।