भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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सुगम चिकित्सा

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तीसरे हफ्ते बुखार घटने लगता है, और बुखार चढ़ने के २१ वें दिन अपने-आप ही बुखार उत्तर जाता है। आँतों में छेद हो जाने और उनसे खून बहने लगने का डर बीमारी के तीसरे हफ्ते में ज्यादा रहता है।

मोतीभर्रा के इलाज में दवा की बहुत कम जरूरत पड़ती है, सबसे जरूरी बात तो रोगी की सफाई, सेवा-टहल और खाने-पीने का ठीक-ठीक बन्दोबस्त करना है। यहाँ किसी रोगी को मोती-भर्रा का शक हो तो घरवालों को चाहिए की उसे तुरन्त पलङ्ग पर एक हवादार साफ कमरे में लिटा दें और किसी अच्छे डाक्टर को दिखावेँ जिससे वह मरीज के खून की जाँच करके बता सके कि सच-मुच मोतीभर्रा ही है।

मरीज के खाने-पीने के लिए पतली चीजें दी जानी चाहिए। गाय का ताज़ा उबाला हुआ दूध रोगी के लिए सब से बढ़िया खुराक है। गोश्त खानेवाले शोरुआ भी ले सकते हैं। पतली खिचड़ी, चावल का माख दूध में पानी मिलाकर साबूदाने की खीर डबल रोटी दूध भुना हुआ आलू, तोरई, टिण्डा, परबल, टमाटर का जूस मरीज के लिए बहुत अच्छी खुराक है। अगर याद रखो की मरीज को एक ही बार में बहुत-सा खाना मत दो। एक साफ सुराही में उबाल-छानकर पानी रोगी के पास रखो और उसे मन चाहे जितना पीने को दो। मोतीभर्रा का मरीज जितना पानी पीवेगा उतना ही उसे फायदा होगा।

मोतीभर्रा के बीमार का गँह खासतौर पर साफ करना चाहिए।