भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 222 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

७७

चमड़ी की बीमारियाँ

दॉत और जीभ को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। एक छोटा चमत्क पिसा हुआ नमक और इतना ही खाने का लोड़ा एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर उससे सुवह-शाम मरीज को कूला कराने से जीभ और दॉत बहुत अच्छी तरह साफ हो जाते हैं।

पेट में ज्यादा दर्द हो तो पेट को गर्म पानी में तैलिया भिगोकर और निचोड़ कर सेकना चाहिए। कच्चा होने पर गर्म पानी का ऐनीमा, और दस्त आने पर स्तार्च की पिचकारी देना चाहिए। इसके देने की रीति यह है कि तीन-चार छोटे चमत्के मैदा लो, और उसे ठण्डे पानी में खूब घोल लो, तब गिलास-भर पानी उसमें और मिलाओ, और उबाल डालो। ठण्डा होने पर ऐनीमा की राति से पेट में पहुँचा दो। पर याद रहे यह घोल खूब पतला होजाय। जरूरत होने पर यह पिचकारी हर दूसरे दिन दी जा सकती है।

अगर बुखार बहुत तेज हो तो मरीज को ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर पोंछ दो। यह काम १५-२० मिनट तक किया जा सकता है। गीले कपड़े को रोगी के शरीर पर फेरकर फिर सूखे कपड़े से उसे मत पोंछो। पंखे से हवा करके शरीर को सुखाओ। इससे मरीज की बेचैनी, गर्मी और घबराहट दूर होगी, उसे चैन पड़ेगा। अगर बुखार कालू में न आये तो दिन में दो-तीन बार भी यह काम किया जा सकता है। इसमें सर्दी लगने का कोई डर नहीं है। तेज बुखार में या सरसाम की हालत में मरीज के सिर पर बर्फ रखना जा सकता है। सिर दर्द बहुत तेज होने पर भी बर्फ रख सकते हैं। बर्फ न मिले तो ठण्डे पानी में कपड़ा तर करके