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सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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चमड़ी की बीमारियाँ

देवता की मानता करते हैं—परन्तु यदि ठीक तौर से मरीज की सम्हाल की जाय तो ठीक बन्फ पर मोतीभरा आप ही आराम हो जाता है।

यह बुखार एक खास तरह के कीड़ों से होता है, जो आँतड़ियों में हो जाते हैं। शुरू में सिरदर्द, बेचैनी, सुस्ती और तमाम बदन में दर्द होता है, अक्सर शुरू में जाड़ा देकर बुखार बढ़ता है, शुरू-शुरू में सुबह के बन्फ १०५ डिग्री बुखार प्रायः रहता है। शाम को १०३ या १०४ तक पहुँच जाता है। नक्ज की चाल ८०-६० फी मिनट हो जाती है। अक्सर यह होता है कि एक-दो दिन बाद बुखार कम हो जाता है, और रोगी काम-धन्धा करने लगता है।

तीन-चार दिन बाद बुखार १०३ डिग्री रहने लगता है, सिर में सख्त दर्द रहता है, जीभ पर सफेद तह जम जाती है, भूख नहीं लगती कुछ खाओ तो कँ हो जाती है, पेट कुछ फूला रहता है और दुखता है, या तो कंठज हो जाता है या दस्त आने लगते हैं। बीमार आदमी बड़ी देर तक सोता रहता है।

दूसरे हफ्ते में बुखार कुछ तेज हो जाता है, पिसू के काटने की तरह लाल-लाल धब्बे पेट पर पड़ जाते हैं, हाँठ और जीभ पर गहरे भूरे रङ्ग की पपड़ी जम जाती है, किसी-किसी बीमार की आँतों में जखम हो जाते हैं तो दस्त की राह खून आता है, इस से मरीज के पाखाने का रङ्ग गुलाबी-सा हो जाता है। अगर आँतों में से खून ज्यादा निकल जाय तो मरीज के मर जाने का भी शंका होता है। कभी-कभी मरीज को मरसाम भी हो जाता है।

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तीसरे हफ्ते बुखार घटने लगता है, और बुखार चढ़ने के २१ वें दिन अपने-आप ही बुखार उत्तर जाता है। आँतों में छेद हो जाने और उनसे खून बहने लगने का डर बीमारी के तीसरे हफ्ते में ज्यादा रहता है।

मोतीभर्रा के इलाज में दवा की बहुत कम जरूरत पड़ती है, सबसे जरूरी बात तो रोगी की सफाई, सेवा-टहल और खाने-पीने का ठीक-ठीक बन्दोबस्त करना है। यहाँ किसी रोगी को मोती-भर्रा का शक हो तो घरवालों को चाहिए की उसे तुरन्त पलङ्ग पर एक हवादार साफ कमरे में लिटा दें और किसी अच्छे डाक्टर को दिखावेँ जिससे वह मरीज के खून की जाँच करके बता सके कि सच-मुच मोतीभर्रा ही है।

मरीज के खाने-पीने के लिए पतली चीजें दी जानी चाहिए। गाय का ताज़ा उबाला हुआ दूध रोगी के लिए सब से बढ़िया खुराक है। गोश्त खानेवाले शोरुआ भी ले सकते हैं। पतली खिचड़ी, चावल का माख दूध में पानी मिलाकर साबूदाने की खीर डबल रोटी दूध भुना हुआ आलू, तोरई, टिण्डा, परबल, टमाटर का जूस मरीज के लिए बहुत अच्छी खुराक है। अगर याद रखो की मरीज को एक ही बार में बहुत-सा खाना मत दो। एक साफ सुराही में उबाल-छानकर पानी रोगी के पास रखो और उसे मन चाहे जितना पीने को दो। मोतीभर्रा का मरीज जितना पानी पीवेगा उतना ही उसे फायदा होगा।

मोतीभर्रा के बीमार का गँह खासतौर पर साफ करना चाहिए।

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चमड़ी की बीमारियाँ

दॉत और जीभ को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। एक छोटा चमत्क पिसा हुआ नमक और इतना ही खाने का लोड़ा एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर उससे सुवह-शाम मरीज को कूला कराने से जीभ और दॉत बहुत अच्छी तरह साफ हो जाते हैं।

पेट में ज्यादा दर्द हो तो पेट को गर्म पानी में तैलिया भिगोकर और निचोड़ कर सेकना चाहिए। कच्चा होने पर गर्म पानी का ऐनीमा, और दस्त आने पर स्तार्च की पिचकारी देना चाहिए। इसके देने की रीति यह है कि तीन-चार छोटे चमत्के मैदा लो, और उसे ठण्डे पानी में खूब घोल लो, तब गिलास-भर पानी उसमें और मिलाओ, और उबाल डालो। ठण्डा होने पर ऐनीमा की राति से पेट में पहुँचा दो। पर याद रहे यह घोल खूब पतला होजाय। जरूरत होने पर यह पिचकारी हर दूसरे दिन दी जा सकती है।

अगर बुखार बहुत तेज हो तो मरीज को ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर पोंछ दो। यह काम १५-२० मिनट तक किया जा सकता है। गीले कपड़े को रोगी के शरीर पर फेरकर फिर सूखे कपड़े से उसे मत पोंछो। पंखे से हवा करके शरीर को सुखाओ। इससे मरीज की बेचैनी, गर्मी और घबराहट दूर होगी, उसे चैन पड़ेगा। अगर बुखार कालू में न आये तो दिन में दो-तीन बार भी यह काम किया जा सकता है। इसमें सर्दी लगने का कोई डर नहीं है। तेज बुखार में या सरसाम की हालत में मरीज के सिर पर बर्फ रखना जा सकता है। सिर दर्द बहुत तेज होने पर भी बर्फ रख सकते हैं। बर्फ न मिले तो ठण्डे पानी में कपड़ा तर करके

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रख सकते हैं। यह कपड़ा पाँच-चार मिनट में बदलते रहना चाहिए।

दस्त के रास्ते अगर खून दिखाई दे तो १०-१२ घण्टों तक कुछ भी खाना मत दो। वर्क मिल सके तो छोटे-छोटे टुकड़े करके कपड़े में लपेटकर पेट पर रख दो, इससे खून बहना रुक जायगा।

बुखार उत्तर जाने पर, मरीज को कड़ाके की भूख लगती है। खबरदार रहो कि उसे कोई कड़ी चीज न दी जाय। पतला और नर्म ही खाना देना चाहिए।

याद रखो कि मरीज के थूक, पेशाब और पाखाने में बीमारी के कीड़े होते हैं। इसलिए इन चीजों को योंही मत फेंक दो, चरना हवा में मिलकर ये कीड़े बीमारी फैलावेंगे। मरीज को साफ कागज या बिथड़ों पर शुक्वा दो, फिर उन्हें जला दो।

मरीज के इस्तैमाल करने के कपड़े-वर्तन अलग रखो और जो खाना मरीज से बच जाय, उसे तन्दुरुस्त आदमी को मत दो। जो लोग, मरीज की सेवा-टहल में लगे हों, वे रसोई-घर में न जाने पावें। तीलिये और रूमाल जिन्हें मरीज अपने काम में लावे, उबाल डाले जायें।

मरीज के अच्छे हो जाने पर जो कपड़े धुल सकते हैं, पानी में उबाल डालने चाहिए। कमरे में चूना पुतवाना चाहिए। गढ़ा हो सके तो जला डालना चाहिए।

हमेशा याद रखो कि मोतीभरों के कीड़े मुँह के रास्ते पेट में जाते हैं। अक्सर ये पानी या खाने की चीजों में होते हैं। लोग

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चमड़ी की बीमारियाँ

मल-मूत्र को ऐसी लापरवाही से फेंक देते हैं कि वह कुखों-तालावों और नालों में चला जाता है। उस पानी को पीने से मोतीफ़रा हो जाता है। गाय-भैंस के दूध में भी बहुत करके ये कीड़े होते हैं। इसलिए दूध और पानी भी ऐसे दिनों में उबाल-कर पीना चाहिए। सख्ती-तरकारी में जो मैले का खाद डाला जाता है, उसमें जो रोग के कीड़े होते हैं, वे तरकारी-साग में चिपक जाते हैं। भक्षिष्यों भी मोतीफ़रा फैलाने में बहुत मदद देती हैं, इन्हें रसोई-घर से दूर रखने के लिए हमेशा खिड़कियों और दरवाजों पर जाली लगवाड़ी और भोजन को कभी उघाड़ा मत छोड़ो।

हाल ही में मोतीफ़रा का टीका लगने की रीति चली है। जो लोग ऐसी जगह में रहते हैं, जहाँ मोतीफ़रे का जोर हो या जिन्हें सफ़र करना पड़े, उनके लिए यह टीका मुफ़ीद है। इसके लगाने से दो-तीन साल तक मोतीफ़रे का डर नहीं रहता।

देहातों में इसे फसली बुखार कहते हैं और कुख्यार-कार्तिक के महीनों में लोग इससे गाँवों में भारी कष्ट पाते हैं। इस रोग में हर साल हजारों आदमी मरते हैं। यह रोग मच्छर मलेरिया के काटने से लगता है। मलेरिया का मच्छर मामूली मच्छर की बनिस्बत अजीब-सा होता है। उसके बैठने की धज भी अलग होती है। जब यह मच्छर किसी को काटता है तो बीमारी के कीड़े आदमी के खून में छोड़ देता है। वे वहाँ लाखों हो जाते हैं, और आदमी बीमार हो जाता है।

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मच्छर हमेशा जल में पैदा होते हैं। मादा अपने अण्डे तालाब के पानी में, धान के खेत में, पोखर में, बाल्टी में, खाली टीन के पीपे में, गड़ों में, देती है। ये अण्डे दो-तीन दिन में रँगनेवाले कीड़े बन जाते हैं और दो हफ्तों में ये पूरे मच्छर बन जाते हैं। याद रखना चाहिए कि बहते हुए पानी में मच्छर नहीं होते हैं। इसलिए उचित है कि घर के आस-पास गढ़े मत रहने दो—तालाब या पोखर हो तो उनमें नालियाँ खोद दो जिसमें पानी बहता रहे या उनमें मछलियाँ पाल लो, और बत्तखें छोड़ दो। ये सब छोटे-छोटे कीड़ों को खा जाती है। घर के आस-पास कहीं गढ़ा हो और उसमें पानी जमा हो तो उसपर थोड़ा मिट्टी का तेल डाल दो जिससे मच्छर मर जावेंगे। यह तेल पानी पर फैलकर एक सतह बनाता है, जिससे कीड़ों को पानी के ऊपर तैरने की गुंजाइश नहीं रहती। २० फिट लम्बे और इतने ही चौड़े तालाब के लिए एक बोतल तेल काफी है। अगर रोज पानी बरसे तो तालाब में हफ्ते में एक बार तेल छिड़कना चाहिए। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ये मच्छर अपनी जगह से ज्यादा दूर नहीं उड़ सकते। मकान से २०० फिट के अन्दर-अन्दर गढ़ा, कूड़ा, कर्कट नहीं रहना चाहिए। मच्छर अक्सर रात को काटते हैं अतः यह सर्वोत्तम बात है कि रात को मच्छरदानी काम में लाई जाय। यह महीन जाली की होनी चाहिए और इस तरह लपेटना चाहिए कि उसमें मच्छर न घुसने पावे।

जाड़ा लगना, ज्वर चढ़ना, पसीना आना, और सिर दर्द ये

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चमड़ी की बीमारियाँ

मलेरिया के साधारण लक्षण हैं। जाड़ा चढ़ने से पहले रोगी को मलेरिया के लक्षण कमजोरी-सी मालूम होती है। कभी-कभी जी मिचलाकर उल्टी हो जाती है। ठण्ड लगने के बाद १०३ या १०४ तक बुखार हो जाता है और दो-तीन घण्टे रहकर उतर जाता है। कभी-कभी रोज भी ज्वर चढ़ता है और कभी दूसरे दिन—एक दिन छोड़कर चढ़ता है। कभी हफ्ते या महीने में दो बार चढ़ता है।

इसकी सही दवाई कुनैन है। जब बुखार जूड़ी दूसरे या तीसरे दिन आवे तो कुनैन खिलाने की सबसे अच्छी रीति यह है कि जिस दिन जूड़ी आने को हो उससे पहले शाम को एक खुराक अण्डा का तेल गर्म पानी में दे दिया जाय। अगर दोपहर के पीछे तीन बजे बुखार चढ़ता हो तो ६ बजे सुबह ही १५ ग्रेन कुनैन खालो। और इसी तरह दूसरे समय ज्वर चढ़ने से ६ घण्टे पहले खालो। इसी तरह दो हफ्ते तक खाना चाहिए। अगर जूड़ी चढ़ने का कोई नियत समय न हो तो सुबह का खाना खाकर १० ग्रेन कुनैन लो और शाम का खाना खाने के पीछे १० ग्रेन कुनैन खाओ। इसी तरह दो-तीन हफ्ते कुनैन खाना चाहिए।

बालकों को एक-एक ग्रेन कुनैन एक दिन में पाँच बार दो। तीन वर्ष से अधिक उम्र के बालक को दो-तीन ग्रेन दो। परन्तु कुनैन ज्यादा दिन तक अकारण नहीं लेनी चाहिए।

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खांसी और गले की बीमारियाँ

खांसी के कई कारण हैं। गले या फेफड़ों में खराबी होने से ज्यादातर खांसी होती है। कभी-कभी कलेजे की खराबी से भी खांसी होती है। खांसी दो प्रकार की होती है, सूखी और तर। कभी-कभी खांसी में खून भी आता है। कफ की खांसी में कफ को पकाकर सफाई कर डालना चाहिए। और सूखी खांसी में तर दवा देना चाहिए।

१—काकड़ा साँगी, कूट-पीसकर काली मिर्च के बराबर गोली पानी में बनाकर मुँह में रखने से कफ की खांसी आराम होती है।

२—छोटी पीपल चिलम में रखकर थुँआ पीने से पुरानी खांसी आराम होती है।

३—सरसों पीसकर शहद में चाटने से कफ की खांसी दूर होती है।

४—बहेड़ा पर घी चुपड़कर भूसल में भून लिया जाय। उसे मुँह में रखने से सब किस्म की खांसी आराम होती है।

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छाती और गले की बीमारियाँ

५—खॉँसी में खून आवे तो अङ्गुस्ते की पत्तियों का एक तोला रस निकाल कर शहद मिलाकर पिलाओ।

६—शहद और अदरख का रस चाटने से सर्दी की खॉँसी दूर होती है।

यह बीमारी वायु और कफ की है। इस रोग में बुढ़ापे में बड़ा कष्ट होता है। इसमें जुलाब लेकर कोठा दमा साफ रखना सबसे अधिक जरूरी है।

१—हल्दी, राई, लोटन सजी चार-चार तोले। गुड़ पुराना १८ तोला कूट-छानकर भरबेरी के समान गोली बनाना और सुबह-शाम खाना। चालीस दिन में सांस आराम होगा।

२—आक का पका पत्ता एक लो उसमें २५ काली मिर्च घोटकर काली मिर्च के समान गोली बनाओ। बड़े आदमी को एक और छोटे को २ गोली दो। फायदा करेगा।

३—शोरा कलभी लेकर पानी में भिगोदो। उसमें एक साफ कपड़ा अच्छी तरह तर करके छाया में सुखालो। उसकी बत्ती बनाकर सिगरेट की तरह बीमार को पिलाओ। इससे आनन-फानन सांस का उठता हुआ जोर कम हो जायगा। पर यह सिगरेट होशियारी से पिजानी चाहिए। क्योंकि वह एकदम जल जाती है। इसके लिए किसी चीज की नलकी बनानी चाहिए।

४—मोर पँख की चन्द्रिका जलाकर कुल्हिया में राख करलो। दो-दो रत्ती राख शहद में सुबह-शाम खाओ। फायदा होगा।

५—तमालू का गुल आग में सफेद जलाकर पोसो, दो रत्ती

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पान में रखकर खाये। खट्टी बादी चीजों से परहेज करे तो सांस का आराम होवे।

६—थोड़े से गेहूँ कोरे शकोरे में रख, जलाकर राख करलो। फिर इनकी बराबर हल्दी को जालालो, दोनों को मिलाकर कूट लो। पहले दिन पाँच मांशे ठण्डे या गर्म पानी से लेवे। फिर रोज एक कौड़ी-भर बढ़ाता जाय, २१ दिन में आराम हो जायगा।

७—तमाखु की हरी पत्तियों का रस एक पाव निचोड़े, उसमें पाव-भर पुराना गुड़ डालकर आँटावे। जब शर्बत बन जाय, छान कर रखे। दो तोला पीवे। उल्टी, दस्त हो जाय तो थोड़ा पीवे। धीरे-धीरे बढ़ावे। इससे पांच-छै दिन में ही आराम हो जायगा।

इस बीमारी का सम्बन्ध पेट की खराबी से है। यह कई प्रकार की होती है। कभी-कभी तो इस रोग में मृत्यु हो जाती है।

इसकी उम्दा दवा यह है कि थोड़ी राई पानी में हिवकी पीसकर गिलास में घोल दो। जब राई नीचे बैठ जाय तो पानी धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा पीओ। चीनी और काली-मिर्च शहद में मिलाकर चाटो। अगर फिर भी बन्द न हो तो राई का पलस्तर पेट पर पांच-छै मिनिट रखो।

अगर बुखार खाँसी के साथ पसली में दर्द हो तो निमोनिया का आन्देशा है। अनेक प्रकार से इलाज कराना चाहिए। सर्दी और बादी का दर्द हो तो यह उपाय करो।

१—बारहसिंह का सींग पानी में घिसकर गुन-गुना कर पसली

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छाती और गले की बीमारियाँ

पर लेप करना चाहिए। और सोट तथा अरपड की जड़ें जो कूट करके पानी में औटाकर गर्म-गर्म पिलाओ।

२—आक की जड़ें लड़के के पेशाब में घिसकर लेप करो। और धूप में बैठो।

३—मेथी और शहद मिलाकर और औटाकर पीने से छाती का पुराना दर्द आराम होता है।

दिल की कमजोरी तथा खून की कमी से कभी-कभी दिल की धड़कन बढ़ जाती है और त्वचीयत घबराने लगती हैं। यह बड़ी भारी बीमारी है। और इसका इलाज बड़े-बड़े डाक्टर ही कर सकते हैं। पर यहाँ हम मामूली इलाज लिखते हैं—

१—गर्मी के दिनों में यह बीमारी हो तो चन्दन या नीम की लकड़ी पानी में घिसकर पीना चाहिए।

२—सुबह एक नारङ्गी या संव खाने से भी बहुतफायदा होता है।

३—गुलाब के फूल या हारसिङ्गार के फूल या सेबंती के फूल जो भी मिल जायें, दूनी चीनी में मिलाकर हाथ से मलो और शीरो के वर्तते में ४० दिन चाँदनी रात में रखो, फिर सुबह एक-एक तोला खाओ। बहुत फायदा करता है।

४—धनिया, किरामिश, मिश्री एक-एक तोला रात को मिट्टी के शकोरे में दो छटाँक पानी में भिगोकर ओस में रख दो। सुबह मल-छानकर पीओ। बहुत फायदा करेगा।

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इस रोग के बीमार को आराम करना चाहिए। धूप और गर्द-गुबार तथा दौड़-धूप से बचना चाहिए, तथा घोड़ा, साइकिल और तेज सवारी पर न चढ़ना चाहिए।

गले में सूजन होने से कोई चीज निगलना मुश्किल होजाता है। इसका इलाज यह है—

१—खट्टे शहद का रस निचोड़कर बराबर दूरा मिलाकर झोंटा ले। आधा रहने पर थोड़ा-थोड़ा पीवे।

२—जीभ पर भी सूजन हो तो मसूर, जौ या अरहर की पत्तियों का पानी पकाकर उससे गरारे करे।

३—धनिया चबाने से भी गले की तकलीफ दूर होती है।

४—सूखा करेला सिरके में घिसकर गुन-गुना गले पर लेप करने से गले की सूजन को मिटाता है।

५—नौसादर का गले पर लेप करने से गले की सूजन दूर होती है।

६—कभी-कभी काग उत्तर आने पर भी गले में तकलीफ हो जाती है, खासकर बच्चों को। मुलतानी मिट्टी में कपड़ा लपेटकर, तालुप की हजामत उत्तरे से कराकर तालू पर रखे।

७—बच्चे का तालू गिर जाने पर चूल्हे की लाल मिट्टी में एक काली मिर्च पीसकर काग को उठावे।

कभी-कभी नजले से भी गला पड़ जाता है। ऐसा हो तो थोड़ी-गला पड़ जाना . सी अफीम खाए और पोस्त के डोड़े और अजवायन दोनों को छोटाकर गरारा करे।

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छाती और गले की बीमारियाँ

२—अदरक के टुकड़े को भीतर से खोखला करके उसमें जरा-सी हींग और नमक भर दें और उसपर कपड़ा लपेटकर आटे की लोई में रख भूसल में गाड़ दें। जब सीमक जाय, सुगन्ध आने लगे तो आँच से निकाल, छीलकर खाय तो आवाज खुल जायगी।

३—चावल गुड़ में पकाकर सोते समय खाय। एक घण्टे पीछे दो चमचे गुन-गुना पानी पीवे। तीन दिन में आवाज खुले।

४—जो सिंदूर खाने से गला खराब हो तो दीये का गुल पान में रखकर खाय।

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पेट की बीमारियाँ

इसे जलन्धर भी कहते हैं, इसकी तीन किस्म है। एक वह जिसमें जोड़ों में सूजन आजाती है। इसकी उत्पत्ति क्लेजे की खराबी से होती है; दूसरा जलोद्बर वाः जिसमें पेट बढ़ जाता है और चमड़ी भारी हो जाती है। पेट पानी से भरी हुई मशक की भाँति नन जाता है, नाभि का गढ़ा भर जाता है, पेट पर उँगली से ठोकने पर तबले के समान आवाज निकलती है ; तीसरा वालोद्बर जिसमें पेट कड़ा हो जाता है तथा दस्त-पेशाब का बन्द लग जाता है।

इस रोग में पानी पीने को नहीं देना चाहिए। ऊँटनी का दूध ही पिलाना चाहिए, या साँक और मकोथ की पोटली पानी में उबालकर वह पानी देना चाहिए। सूरज की ओर पीठकर धूप में बैठावे। रोगी को सहते हुए गर्म बालू रेत में छाती तक दबा दे। और जितनी देर मुमकिन हो दबाये रखे। तेज जुलाब दे।

१—एक छटाँक खिले हुए चने का बेसन लेकर उसपर थूहर

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पेट की बीमारियाँ

का दूध इतना निचोड़ो कि घोल हो जाय। फिर घी में उसकी पकोड़ियाँ तोड़ लो और उन्हें पानी में खरल करके कालीमिर्च-सी गोलियाँ बनालो। दो-से-चार गोली तक रोगी की ताकत देखकर जुलाव के लिए ठपड़े पानी के साथ दो। यह जुलाव दूसरे-तीसरे दिन देते रहो।

२—पुराने लोहे का मैल जो अक्सर गाँवों के खेड़े में या पुरानी जगहों में दवा मिल जाता है, आग में लाल करके तीन बार गाय के पेशाब में, तीन बार एक पाव छाछ में और तीन बार सरसों के तेल में बुझवा दो। फिर कूट-छानकर दस सेर गाय के पेशाब में घोलकर लोहे की कड़ाही में ढाल चूल्हे पर रखकर पानी जला दो। जब नमक-सा जम जाय तो कूट-छानकर एक दुअन्नी-भर उसमें से रोगी को खाने को दो।

३—खूब सड़ा हुआ हुक्के का पानी रोगी को दो। मात्रा, दो तोला।

४—गोबर जलाकर उसकी साढ़े तीन माशा राख की फंकी कराओ।

५—इन्द्रायन की जड़ पानी में पीसकर पेट पर लेप करे और फल पानी में उबाल कर पीवे।

तिल्ली पेट की बाँई और पसली के नीचे होती है। मलेरिया

मुखार के बाद या अन्य कारणों से भी यह तिल्ली कभी-कभी बढ़कर कछुए के बराबर सारे पेट

में फैल जाती है। उसका इलाज यह है—

सुगम चिकित्सा

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१—चूना बिना बुभा हूआ और एक रीठे की भाँग घूटकर केले की पक्की फली के टुकड़े में रखकर दाहिने पहुँचे के नीचे जोड़ पर बीच की उँगली के सामने एक पहरतक मोटे कपड़े से बाँध रखो। बम बहो फसोला पड़ जायगा। उसे चाकू से न्योलकर पानी निकाल दो। निल्ली को आराम हो जायगा।

२—अजवाइन जितनी खा सके दोनों समय खाय।

३—सरसों का तेल निल्ली पर गुन-गुना मले।

४—मूली के बीज पीसकर निरके के साथ खाय।

५—अगर बुखार न हो तो ६ माशा मन्नी गुड़ में मिलाकर खाय।

जिसमें मरोड़ के साथ आँव थोड़ा-थोड़ा चार-चार निकलना है, कभी-कभी खून भी जाता है और मवाद पेशिश पड़ जाता है।

१—सोंठ, कालीमिर्च, बड़ी हरड का छिलका, तीनों चीजें बराबर लो, फिर तबे पर घी छोड़कर उन्हें अलग-अलग भून लो। भुन जाने पर उतना ही कालानमक मिलाकर कूटकर चूर्ण बना कर छः-छः माशा की पुड़िया बनाकर आध पाव दही के साथ मिलाकर खिलाओ। दिन में दो या तीन बार दही-भात भोजन दो। जल्द आराम होगा। प्यास लगने पर गर्म पानी पीना चाहिए।

२—सोंफ को घी में भूना, फिर कूट-छानकर बराबर कच्ची खाँड़ के साथ मिलाकर मादे मात माशा खाय, और ऊपर से ताजा पानी पीवे। तो खून पेशिश को फायदा करे।

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पेट की बीमारियाँ

पतले दस्त होने पर अफीम और पान में खाने का चूना मिला- कर मोठ के बराबर गोली बनाकर सुवह-शाम दस्त पानी के साथ खाय ।

अगर खाना न पचने से पेट में दर्द हुआ हो तो नमक का पानी पिलाकर उल्टी कराओ । एक सेर गर्म पेट का दर्द-शूल पानी में एक चम्मच नमक काफी है । फायदा होने पर पतली खिचड़ी खिलाओ ।

बाड़ी का दर्द हो तो गेहूँ की भूसी, साम्हर और बाजरा की पोटली बना, तबे पर गर्म करके सेको । अजवाइन डेढ़ माशा की गर्म पानी से फंकी लो ।

१—सुहागा सुना सात माशो, अजवाइन तीन तोले, कालीमिचे साढ़े तीन तोले, एलुआ चार तोले आठ माशा, कूट-छानकर पाठे के रस में चने बराबर गोली बनाना । सब प्रकार के शूल को दूर करे । बाड़ी में तीन गोली अजीर्ण में दो गोली काफी है । पेट बढ़ जाने पर यह दवा बहुत गुण करती है ।

२—भूख बढ़ाने की यह दवा सबसे अच्छी है—लाल मिर्चे नीवू के रस में चालीस दिन घोटे, फिर दो रत्ती पान में रखकर खाय ।

३—सनाय, सोंफ, बड़ी हरड का छिलका, नमक सैधा, बरा- बर कूट-छानकर चूर्ण बनाना । छः माशा चूर्ण गर्म पानी से फंकी लेने से दस्त साफ लाता है ।

सुगम वाक्यस्य

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उल्टी और जी मिचलाना १—थोड़ा गेहूँ आग में लाल करके पानी में बुझाओ, वह पानी थोड़ा-थोड़ा पिलाने से उल्टी दूर होती है।

२—नीम की टहनी पत्तों सहित भूभल में दवा दो, गर्म होने पर पीस-छानकर पीने से जी मिचलाना और उल्टी आराम होती है।

३—इमली में रूखने से जी मिचलाना बन्द होता है।

४—अगर उल्टी में कफ निकलता हो तो यह करे कि एक चम्मच में घी गरम करो, उसमें दो बत्ताशे डाल दो, एक घड़ी के अन्तर से एक-एक बत्ताशा खाओ, तो कफ की उल्टी दूर हो।

एक माशा, हाँग एक तोला घी में गर्म करो। फिर एक मिट्टी का दीवला खूब लाल करके उसमें वह हाँग और घी डाल दो और उसे एक पाव दूध में दीवले समेत छोड़ दो। वह दूध पीने से शूल और अफारा दूर होगा।

२—नाभी में हाँग का फाया रखने से भी अफारा दूर होता है।

३—निसोत दो हिस्सा, पीपल चार हिस्सा, हरड्ड बड़ी पाँच हिस्सा, सबके बराबर गुड़, कूट-पीसकर चार आने-भर की गोली बनाकर गर्म पानी से सेवन करने से अफारा दूर होता है।

दिल के पास, पसलियों के नीचे, नाभि के नजदीक और मसाने में एक गाँठ पैदा होजाती है, उसे गोले वाय गोला की बीमारी कहते हैं। जब यह बीमारी पैदा होने को होती है तब भूख नहीं लगती, दस्त में कब्ज हो जाता है, पेट

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पेट की बीमारियाँ

में गुड़-गुड़ आवाज़ आती है, पेट फूल जाता है, तथा दर्द रहता है। जहाँ गोला होता है वहाँ दर्द ज्यादा रहता है।

१—साँठ चार तोला, सफेद तिल सोलह तोला, पुराना गुड़ आठ तोला, इकट्ठा पीयकर आधा तोला या एक तोला गरम दूध के साथ इस्तेमाल करने से सब प्रकार का गोला आराम होता है।

२—आधा तोला सज्जी और इतना ही गुड़ मिलाकर खाने से भी चायगोला आराम होता है।

इस बीमारी में हल्का भोजन करना और ज्यादा मिहनत नहीं करना चाहिए। पेट साफ रखना भी बहुत जरूरी है।

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बड़ी-बड़ी बीमारियाँ

ये बीमारियाँ बहुत मुश्किल से आराम होती हैं। इनका इलाज हमेशा अच्छे वैद्य या डाक्टरों से कराना चाहिए। फिर भी हम यहाँ उनके विषय में साधारण इलाज लिखते हैं।

गुदा के ठीक सँह पर या कुछ भीतर छोटी-छोटी गिल्टियाँ बन जाती हैं। ये गिल्टियाँ इस भाग की नसों के सिकुड़ने से पड़ जाती हैं। इसकी जड़ कब्ज है। इसलिए इस बवासीर रोग में सबसे पहला काम कब्ज को दूर करना है। बवासीर दो प्रकार की होती है, एक खूनी दूसरी वादी।

खूनी बवासीर में एकाएक रक्त को बन्द नहीं करना चाहिए। हाँ खून ज्यादा निकले और रोगी कमजोर होजाय तो बन्द कर देना चाहिए।

१—चूतड़ की हड्डी पर सींगी लगावे तो बवासीर को आराम हो।

२—एक बड़ी मूली लेकर खोखली कर लो और उसमें जितना ,