भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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सुगम विक्रिता

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खुरएड जम जाता है । क़रीब-क़रीब तीसरे हफ़्ते में वह सूखकर छूट जाता है और टीके का निशान वोह पर बना रहता है । इस बात का खयाल रखना चाहिए कि खुरएड को कभी खुजाना नहीं और अपने हाथ से उखाड़ना भी नहीं । उसमें धूल-मिट्टी नहीं लगनी चाहिए, न भटका लगना चाहिए ।

यह टीका इतना सहल और मामूली है कि हम यह कभी नहीं सोच सकते कि इसके लिए कितनी भारी खोज की गई होगी । इस टीके के बारे में खोज करने के लिए जो बड़े-बड़े डाक्टरों का रॉयल कमीशन बैठा था उसने जाँच करके यह बताया था कि इस सीधीसादी तरकीब से चेचक का बहुत-कुछ बचाव होता है । अगर चेचक निकलती भी है तो ज़हर बहुत-कम असर करता है । आदमी कम मरते हैं । रोगी को तकलीफ़ भी बहुत-कम होती है ।

पहले लोगों का यह खयाल था कि बचपन में टीका लगवाने से जन्म-भर के लिए चेचक का डर नहीं रहता । लेकिन फिर यह देखा गया कि अगर १२ बरस की उम्र में फिर एक बार टीका लगा दिया जाय तो चेचक कभी नहीं निकल सकती ।

बच्चों को तीन हफ़्ते की उम्र होने के बाद तीन महीने की उम्र के भीतर-भीतर टीका लगवा देना चाहिए । दुबारा ज़रूरत हो तो १२ बरस की उम्र में लगवाया जाय ।

अगर किसी बच्चे या बड़े आदमी के चेचक निकल भी आवे तो इन बातों की संभाल रखो:—