सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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चमड़ी की बीमारियाँ
यह देखा गया है कि चर्बों और चूड़ों पर इसका ज्यादा जोर होता है। दाने ज्यादा निकलने से, तेज बुखार आने से, फेफड़ों पर सूजन आने से रोगी की न से १३ दिन के भीतर खतरनाक हालत हो जाती है और वह मर जाता है। जवान आदमी बहुत कम मरते हैं—लेकिन गर्भवती स्त्रियों के बच्चे जीज जाते हैं। इस रोग में वृद्ध से बहुत बढ़ाव आती है।
इससे बचने की सबसे अच्छी तरकीब टीका लगवाना है। सन् १७६८ ईस्वी में डाक्टर एडवर्ड जेनर ने सबसे पहले इस तरकीब को ढूँढ़ निकाला। इस खोज से चेचक के हमले का डर जाता रहा। जिस देश में चेचक का टीका लगाने का रिवाज है वहाँ कोई ही इस रोग की चपेट में आता है और अगर आ भी गया तो उसका फौरन इलाज हो जाता है।
टीका लगवाने में जरा भी तकलीफ नहीं होती। आजकल बहुत होशियारी से टीका लगाया जाता है। वहाँ में नश्तर से तीन या चार निशान करके ग्लेसरीन में दवा मिलाकर लगा देते हैं। अगर इन सब बातों का ध्यान रखा जाय तो किसी बात का भी आदेश नहीं रहता। बचा अगर तन्दुरुस्त है तो उसपर कुछ भी घुरा असर नहीं पड़ेगा। टीका लगाने के तीन दिन बाद उस जगह फुसियाँ निकली हुई मालूम देती हैं जो बाद में लाल होती जाती हैं। इसके बाद ही इनके भीतर साफ पानी मालूम पड़ने लगता है। इनकी शक़ल फफोलों की तरह हो जाती है जो आठवें दिन पक जाते हैं। पानी का पीब बनता है। वह सूख जाता है, और