सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ें७३
चमड़ी की बीमारियाँ
१—रोगी का कमरा खूब साफ और खूशबूदार हो। किवाड़ों और खिड़कियों पर नीम की हरी डालियाँ लगा दी जायँ।
२—कोई मैला आदमी रोगी के पास न जाय। उसे आराम से सोने दो।
३—मूँठे या गंदे हाथों से रोगी को न छुआ जाय।
४—छालों से पीब या पानी बहता हो तो यह करे कि पट्टी के कपड़े को टपड़े पानी में जिसमें २ प्रतिशत कारबोलिक एसिड मिला हो, भिगोकर रोगी के चेहरे और हाथों पर धरावर लगाते रहो। जब दाने सूखने लगें और पपड़ी पड़ने लगे तो उनपर वार-बार बेसलीन लगाओ। अगर देहात में यह इलाज नहीं हो सके तो सफेद कल्था वारीक पीसकर पीब भरे दानों पर घुस्कते रहो। या झरने उपलों की छनी हुई राख घुस्क दो। या विछौन पर विछा दो, पर वह रोज बदल दी जाय।
५—बच्चों को कभी भी दानों को मत खजाने दो—नहीं तो दानों में गढ़े पड़ जायेंगे।
६—आँखों की संभाल खास्तौर पर रखो। बोरिक लोशन में कपड़े का एक टुकड़ा भिगोकर थोड़ी-थोड़ी देर में पलकों को धो दिया करो। आँख के पोटे को धो और सुखाकर पलकों के किनारे थोड़ा-सा बेसलीन लगा दो। तीन-तीन घण्टे में बोरिक लोशन की बूँदें आँखों में डालते रहो।
अब हम थोड़ा इलाज भी बताते हैं—
१—शुक्र में बनगोभी १॥ माशा, कालीमिर्च ५ दाने घोट-पीस