सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
सुगम चिकित्सा
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मच्छर हमेशा जल में पैदा होते हैं। मादा अपने अण्डे तालाब के पानी में, धान के खेत में, पोखर में, बाल्टी में, खाली टीन के पीपे में, गड़ों में, देती है। ये अण्डे दो-तीन दिन में रँगनेवाले कीड़े बन जाते हैं और दो हफ्तों में ये पूरे मच्छर बन जाते हैं। याद रखना चाहिए कि बहते हुए पानी में मच्छर नहीं होते हैं। इसलिए उचित है कि घर के आस-पास गढ़े मत रहने दो—तालाब या पोखर हो तो उनमें नालियाँ खोद दो जिसमें पानी बहता रहे या उनमें मछलियाँ पाल लो, और बत्तखें छोड़ दो। ये सब छोटे-छोटे कीड़ों को खा जाती है। घर के आस-पास कहीं गढ़ा हो और उसमें पानी जमा हो तो उसपर थोड़ा मिट्टी का तेल डाल दो जिससे मच्छर मर जावेंगे। यह तेल पानी पर फैलकर एक सतह बनाता है, जिससे कीड़ों को पानी के ऊपर तैरने की गुंजाइश नहीं रहती। २० फिट लम्बे और इतने ही चौड़े तालाब के लिए एक बोतल तेल काफी है। अगर रोज पानी बरसे तो तालाब में हफ्ते में एक बार तेल छिड़कना चाहिए। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ये मच्छर अपनी जगह से ज्यादा दूर नहीं उड़ सकते। मकान से २०० फिट के अन्दर-अन्दर गढ़ा, कूड़ा, कर्कट नहीं रहना चाहिए। मच्छर अक्सर रात को काटते हैं अतः यह सर्वोत्तम बात है कि रात को मच्छरदानी काम में लाई जाय। यह महीन जाली की होनी चाहिए और इस तरह लपेटना चाहिए कि उसमें मच्छर न घुसने पावे।
जाड़ा लगना, ज्वर चढ़ना, पसीना आना, और सिर दर्द ये
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चमड़ी की बीमारियाँ
मलेरिया के साधारण लक्षण हैं। जाड़ा चढ़ने से पहले रोगी को मलेरिया के लक्षण कमजोरी-सी मालूम होती है। कभी-कभी जी मिचलाकर उल्टी हो जाती है। ठण्ड लगने के बाद १०३ या १०४ तक बुखार हो जाता है और दो-तीन घण्टे रहकर उतर जाता है। कभी-कभी रोज भी ज्वर चढ़ता है और कभी दूसरे दिन—एक दिन छोड़कर चढ़ता है। कभी हफ्ते या महीने में दो बार चढ़ता है।
इसकी सही दवाई कुनैन है। जब बुखार जूड़ी दूसरे या तीसरे दिन आवे तो कुनैन खिलाने की सबसे अच्छी रीति यह है कि जिस दिन जूड़ी आने को हो उससे पहले शाम को एक खुराक अण्डा का तेल गर्म पानी में दे दिया जाय। अगर दोपहर के पीछे तीन बजे बुखार चढ़ता हो तो ६ बजे सुबह ही १५ ग्रेन कुनैन खालो। और इसी तरह दूसरे समय ज्वर चढ़ने से ६ घण्टे पहले खालो। इसी तरह दो हफ्ते तक खाना चाहिए। अगर जूड़ी चढ़ने का कोई नियत समय न हो तो सुबह का खाना खाकर १० ग्रेन कुनैन लो और शाम का खाना खाने के पीछे १० ग्रेन कुनैन खाओ। इसी तरह दो-तीन हफ्ते कुनैन खाना चाहिए।
बालकों को एक-एक ग्रेन कुनैन एक दिन में पाँच बार दो। तीन वर्ष से अधिक उम्र के बालक को दो-तीन ग्रेन दो। परन्तु कुनैन ज्यादा दिन तक अकारण नहीं लेनी चाहिए।
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खांसी और गले की बीमारियाँ
खांसी के कई कारण हैं। गले या फेफड़ों में खराबी होने से ज्यादातर खांसी होती है। कभी-कभी कलेजे की खराबी से भी खांसी होती है। खांसी दो प्रकार की होती है, सूखी और तर। कभी-कभी खांसी में खून भी आता है। कफ की खांसी में कफ को पकाकर सफाई कर डालना चाहिए। और सूखी खांसी में तर दवा देना चाहिए।
१—काकड़ा साँगी, कूट-पीसकर काली मिर्च के बराबर गोली पानी में बनाकर मुँह में रखने से कफ की खांसी आराम होती है।
२—छोटी पीपल चिलम में रखकर थुँआ पीने से पुरानी खांसी आराम होती है।
३—सरसों पीसकर शहद में चाटने से कफ की खांसी दूर होती है।
४—बहेड़ा पर घी चुपड़कर भूसल में भून लिया जाय। उसे मुँह में रखने से सब किस्म की खांसी आराम होती है।
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छाती और गले की बीमारियाँ
५—खॉँसी में खून आवे तो अङ्गुस्ते की पत्तियों का एक तोला रस निकाल कर शहद मिलाकर पिलाओ।
६—शहद और अदरख का रस चाटने से सर्दी की खॉँसी दूर होती है।
यह बीमारी वायु और कफ की है। इस रोग में बुढ़ापे में बड़ा कष्ट होता है। इसमें जुलाब लेकर कोठा दमा साफ रखना सबसे अधिक जरूरी है।
१—हल्दी, राई, लोटन सजी चार-चार तोले। गुड़ पुराना १८ तोला कूट-छानकर भरबेरी के समान गोली बनाना और सुबह-शाम खाना। चालीस दिन में सांस आराम होगा।
२—आक का पका पत्ता एक लो उसमें २५ काली मिर्च घोटकर काली मिर्च के समान गोली बनाओ। बड़े आदमी को एक और छोटे को २ गोली दो। फायदा करेगा।
३—शोरा कलभी लेकर पानी में भिगोदो। उसमें एक साफ कपड़ा अच्छी तरह तर करके छाया में सुखालो। उसकी बत्ती बनाकर सिगरेट की तरह बीमार को पिलाओ। इससे आनन-फानन सांस का उठता हुआ जोर कम हो जायगा। पर यह सिगरेट होशियारी से पिजानी चाहिए। क्योंकि वह एकदम जल जाती है। इसके लिए किसी चीज की नलकी बनानी चाहिए।
४—मोर पँख की चन्द्रिका जलाकर कुल्हिया में राख करलो। दो-दो रत्ती राख शहद में सुबह-शाम खाओ। फायदा होगा।
५—तमालू का गुल आग में सफेद जलाकर पोसो, दो रत्ती
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पान में रखकर खाये। खट्टी बादी चीजों से परहेज करे तो सांस का आराम होवे।
६—थोड़े से गेहूँ कोरे शकोरे में रख, जलाकर राख करलो। फिर इनकी बराबर हल्दी को जालालो, दोनों को मिलाकर कूट लो। पहले दिन पाँच मांशे ठण्डे या गर्म पानी से लेवे। फिर रोज एक कौड़ी-भर बढ़ाता जाय, २१ दिन में आराम हो जायगा।
७—तमाखु की हरी पत्तियों का रस एक पाव निचोड़े, उसमें पाव-भर पुराना गुड़ डालकर आँटावे। जब शर्बत बन जाय, छान कर रखे। दो तोला पीवे। उल्टी, दस्त हो जाय तो थोड़ा पीवे। धीरे-धीरे बढ़ावे। इससे पांच-छै दिन में ही आराम हो जायगा।
इस बीमारी का सम्बन्ध पेट की खराबी से है। यह कई प्रकार की होती है। कभी-कभी तो इस रोग में मृत्यु हो जाती है।
इसकी उम्दा दवा यह है कि थोड़ी राई पानी में हिवकी पीसकर गिलास में घोल दो। जब राई नीचे बैठ जाय तो पानी धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा पीओ। चीनी और काली-मिर्च शहद में मिलाकर चाटो। अगर फिर भी बन्द न हो तो राई का पलस्तर पेट पर पांच-छै मिनिट रखो।
अगर बुखार खाँसी के साथ पसली में दर्द हो तो निमोनिया का आन्देशा है। अनेक प्रकार से इलाज कराना चाहिए। सर्दी और बादी का दर्द हो तो यह उपाय करो।
१—बारहसिंह का सींग पानी में घिसकर गुन-गुना कर पसली
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छाती और गले की बीमारियाँ
पर लेप करना चाहिए। और सोट तथा अरपड की जड़ें जो कूट करके पानी में औटाकर गर्म-गर्म पिलाओ।
२—आक की जड़ें लड़के के पेशाब में घिसकर लेप करो। और धूप में बैठो।
३—मेथी और शहद मिलाकर और औटाकर पीने से छाती का पुराना दर्द आराम होता है।
दिल की कमजोरी तथा खून की कमी से कभी-कभी दिल की धड़कन बढ़ जाती है और त्वचीयत घबराने लगती हैं। यह बड़ी भारी बीमारी है। और इसका इलाज बड़े-बड़े डाक्टर ही कर सकते हैं। पर यहाँ हम मामूली इलाज लिखते हैं—
१—गर्मी के दिनों में यह बीमारी हो तो चन्दन या नीम की लकड़ी पानी में घिसकर पीना चाहिए।
२—सुबह एक नारङ्गी या संव खाने से भी बहुतफायदा होता है।
३—गुलाब के फूल या हारसिङ्गार के फूल या सेबंती के फूल जो भी मिल जायें, दूनी चीनी में मिलाकर हाथ से मलो और शीरो के वर्तते में ४० दिन चाँदनी रात में रखो, फिर सुबह एक-एक तोला खाओ। बहुत फायदा करता है।
४—धनिया, किरामिश, मिश्री एक-एक तोला रात को मिट्टी के शकोरे में दो छटाँक पानी में भिगोकर ओस में रख दो। सुबह मल-छानकर पीओ। बहुत फायदा करेगा।
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इस रोग के बीमार को आराम करना चाहिए। धूप और गर्द-गुबार तथा दौड़-धूप से बचना चाहिए, तथा घोड़ा, साइकिल और तेज सवारी पर न चढ़ना चाहिए।
गले में सूजन होने से कोई चीज निगलना मुश्किल होजाता है। इसका इलाज यह है—
१—खट्टे शहद का रस निचोड़कर बराबर दूरा मिलाकर झोंटा ले। आधा रहने पर थोड़ा-थोड़ा पीवे।
२—जीभ पर भी सूजन हो तो मसूर, जौ या अरहर की पत्तियों का पानी पकाकर उससे गरारे करे।
३—धनिया चबाने से भी गले की तकलीफ दूर होती है।
४—सूखा करेला सिरके में घिसकर गुन-गुना गले पर लेप करने से गले की सूजन को मिटाता है।
५—नौसादर का गले पर लेप करने से गले की सूजन दूर होती है।
६—कभी-कभी काग उत्तर आने पर भी गले में तकलीफ हो जाती है, खासकर बच्चों को। मुलतानी मिट्टी में कपड़ा लपेटकर, तालुप की हजामत उत्तरे से कराकर तालू पर रखे।
७—बच्चे का तालू गिर जाने पर चूल्हे की लाल मिट्टी में एक काली मिर्च पीसकर काग को उठावे।
कभी-कभी नजले से भी गला पड़ जाता है। ऐसा हो तो थोड़ी-गला पड़ जाना . सी अफीम खाए और पोस्त के डोड़े और अजवायन दोनों को छोटाकर गरारा करे।
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छाती और गले की बीमारियाँ
२—अदरक के टुकड़े को भीतर से खोखला करके उसमें जरा-सी हींग और नमक भर दें और उसपर कपड़ा लपेटकर आटे की लोई में रख भूसल में गाड़ दें। जब सीमक जाय, सुगन्ध आने लगे तो आँच से निकाल, छीलकर खाय तो आवाज खुल जायगी।
३—चावल गुड़ में पकाकर सोते समय खाय। एक घण्टे पीछे दो चमचे गुन-गुना पानी पीवे। तीन दिन में आवाज खुले।
४—जो सिंदूर खाने से गला खराब हो तो दीये का गुल पान में रखकर खाय।
: १३ :
पेट की बीमारियाँ
इसे जलन्धर भी कहते हैं, इसकी तीन किस्म है। एक वह जिसमें जोड़ों में सूजन आजाती है। इसकी उत्पत्ति क्लेजे की खराबी से होती है; दूसरा जलोद्बर वाः जिसमें पेट बढ़ जाता है और चमड़ी भारी हो जाती है। पेट पानी से भरी हुई मशक की भाँति नन जाता है, नाभि का गढ़ा भर जाता है, पेट पर उँगली से ठोकने पर तबले के समान आवाज निकलती है ; तीसरा वालोद्बर जिसमें पेट कड़ा हो जाता है तथा दस्त-पेशाब का बन्द लग जाता है।
इस रोग में पानी पीने को नहीं देना चाहिए। ऊँटनी का दूध ही पिलाना चाहिए, या साँक और मकोथ की पोटली पानी में उबालकर वह पानी देना चाहिए। सूरज की ओर पीठकर धूप में बैठावे। रोगी को सहते हुए गर्म बालू रेत में छाती तक दबा दे। और जितनी देर मुमकिन हो दबाये रखे। तेज जुलाब दे।
१—एक छटाँक खिले हुए चने का बेसन लेकर उसपर थूहर
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पेट की बीमारियाँ
का दूध इतना निचोड़ो कि घोल हो जाय। फिर घी में उसकी पकोड़ियाँ तोड़ लो और उन्हें पानी में खरल करके कालीमिर्च-सी गोलियाँ बनालो। दो-से-चार गोली तक रोगी की ताकत देखकर जुलाव के लिए ठपड़े पानी के साथ दो। यह जुलाव दूसरे-तीसरे दिन देते रहो।
२—पुराने लोहे का मैल जो अक्सर गाँवों के खेड़े में या पुरानी जगहों में दवा मिल जाता है, आग में लाल करके तीन बार गाय के पेशाब में, तीन बार एक पाव छाछ में और तीन बार सरसों के तेल में बुझवा दो। फिर कूट-छानकर दस सेर गाय के पेशाब में घोलकर लोहे की कड़ाही में ढाल चूल्हे पर रखकर पानी जला दो। जब नमक-सा जम जाय तो कूट-छानकर एक दुअन्नी-भर उसमें से रोगी को खाने को दो।
३—खूब सड़ा हुआ हुक्के का पानी रोगी को दो। मात्रा, दो तोला।
४—गोबर जलाकर उसकी साढ़े तीन माशा राख की फंकी कराओ।
५—इन्द्रायन की जड़ पानी में पीसकर पेट पर लेप करे और फल पानी में उबाल कर पीवे।
तिल्ली पेट की बाँई और पसली के नीचे होती है। मलेरिया
मुखार के बाद या अन्य कारणों से भी यह तिल्ली कभी-कभी बढ़कर कछुए के बराबर सारे पेट
में फैल जाती है। उसका इलाज यह है—
सुगम चिकित्सा
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१—चूना बिना बुभा हूआ और एक रीठे की भाँग घूटकर केले की पक्की फली के टुकड़े में रखकर दाहिने पहुँचे के नीचे जोड़ पर बीच की उँगली के सामने एक पहरतक मोटे कपड़े से बाँध रखो। बम बहो फसोला पड़ जायगा। उसे चाकू से न्योलकर पानी निकाल दो। निल्ली को आराम हो जायगा।
२—अजवाइन जितनी खा सके दोनों समय खाय।
३—सरसों का तेल निल्ली पर गुन-गुना मले।
४—मूली के बीज पीसकर निरके के साथ खाय।
५—अगर बुखार न हो तो ६ माशा मन्नी गुड़ में मिलाकर खाय।
जिसमें मरोड़ के साथ आँव थोड़ा-थोड़ा चार-चार निकलना है, कभी-कभी खून भी जाता है और मवाद पेशिश पड़ जाता है।
१—सोंठ, कालीमिर्च, बड़ी हरड का छिलका, तीनों चीजें बराबर लो, फिर तबे पर घी छोड़कर उन्हें अलग-अलग भून लो। भुन जाने पर उतना ही कालानमक मिलाकर कूटकर चूर्ण बना कर छः-छः माशा की पुड़िया बनाकर आध पाव दही के साथ मिलाकर खिलाओ। दिन में दो या तीन बार दही-भात भोजन दो। जल्द आराम होगा। प्यास लगने पर गर्म पानी पीना चाहिए।
२—सोंफ को घी में भूना, फिर कूट-छानकर बराबर कच्ची खाँड़ के साथ मिलाकर मादे मात माशा खाय, और ऊपर से ताजा पानी पीवे। तो खून पेशिश को फायदा करे।
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पेट की बीमारियाँ
पतले दस्त होने पर अफीम और पान में खाने का चूना मिला- कर मोठ के बराबर गोली बनाकर सुवह-शाम दस्त पानी के साथ खाय ।
अगर खाना न पचने से पेट में दर्द हुआ हो तो नमक का पानी पिलाकर उल्टी कराओ । एक सेर गर्म पेट का दर्द-शूल पानी में एक चम्मच नमक काफी है । फायदा होने पर पतली खिचड़ी खिलाओ ।
बाड़ी का दर्द हो तो गेहूँ की भूसी, साम्हर और बाजरा की पोटली बना, तबे पर गर्म करके सेको । अजवाइन डेढ़ माशा की गर्म पानी से फंकी लो ।
१—सुहागा सुना सात माशो, अजवाइन तीन तोले, कालीमिचे साढ़े तीन तोले, एलुआ चार तोले आठ माशा, कूट-छानकर पाठे के रस में चने बराबर गोली बनाना । सब प्रकार के शूल को दूर करे । बाड़ी में तीन गोली अजीर्ण में दो गोली काफी है । पेट बढ़ जाने पर यह दवा बहुत गुण करती है ।
२—भूख बढ़ाने की यह दवा सबसे अच्छी है—लाल मिर्चे नीवू के रस में चालीस दिन घोटे, फिर दो रत्ती पान में रखकर खाय ।
३—सनाय, सोंफ, बड़ी हरड का छिलका, नमक सैधा, बरा- बर कूट-छानकर चूर्ण बनाना । छः माशा चूर्ण गर्म पानी से फंकी लेने से दस्त साफ लाता है ।
सुगम वाक्यस्य
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उल्टी और जी मिचलाना १—थोड़ा गेहूँ आग में लाल करके पानी में बुझाओ, वह पानी थोड़ा-थोड़ा पिलाने से उल्टी दूर होती है।
२—नीम की टहनी पत्तों सहित भूभल में दवा दो, गर्म होने पर पीस-छानकर पीने से जी मिचलाना और उल्टी आराम होती है।
३—इमली में रूखने से जी मिचलाना बन्द होता है।
४—अगर उल्टी में कफ निकलता हो तो यह करे कि एक चम्मच में घी गरम करो, उसमें दो बत्ताशे डाल दो, एक घड़ी के अन्तर से एक-एक बत्ताशा खाओ, तो कफ की उल्टी दूर हो।
एक माशा, हाँग एक तोला घी में गर्म करो। फिर एक मिट्टी का दीवला खूब लाल करके उसमें वह हाँग और घी डाल दो और उसे एक पाव दूध में दीवले समेत छोड़ दो। वह दूध पीने से शूल और अफारा दूर होगा।
२—नाभी में हाँग का फाया रखने से भी अफारा दूर होता है।
३—निसोत दो हिस्सा, पीपल चार हिस्सा, हरड्ड बड़ी पाँच हिस्सा, सबके बराबर गुड़, कूट-पीसकर चार आने-भर की गोली बनाकर गर्म पानी से सेवन करने से अफारा दूर होता है।
दिल के पास, पसलियों के नीचे, नाभि के नजदीक और मसाने में एक गाँठ पैदा होजाती है, उसे गोले वाय गोला की बीमारी कहते हैं। जब यह बीमारी पैदा होने को होती है तब भूख नहीं लगती, दस्त में कब्ज हो जाता है, पेट
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पेट की बीमारियाँ
में गुड़-गुड़ आवाज़ आती है, पेट फूल जाता है, तथा दर्द रहता है। जहाँ गोला होता है वहाँ दर्द ज्यादा रहता है।
१—साँठ चार तोला, सफेद तिल सोलह तोला, पुराना गुड़ आठ तोला, इकट्ठा पीयकर आधा तोला या एक तोला गरम दूध के साथ इस्तेमाल करने से सब प्रकार का गोला आराम होता है।
२—आधा तोला सज्जी और इतना ही गुड़ मिलाकर खाने से भी चायगोला आराम होता है।
इस बीमारी में हल्का भोजन करना और ज्यादा मिहनत नहीं करना चाहिए। पेट साफ रखना भी बहुत जरूरी है।
: १४ :
बड़ी-बड़ी बीमारियाँ
ये बीमारियाँ बहुत मुश्किल से आराम होती हैं। इनका इलाज हमेशा अच्छे वैद्य या डाक्टरों से कराना चाहिए। फिर भी हम यहाँ उनके विषय में साधारण इलाज लिखते हैं।
गुदा के ठीक सँह पर या कुछ भीतर छोटी-छोटी गिल्टियाँ बन जाती हैं। ये गिल्टियाँ इस भाग की नसों के सिकुड़ने से पड़ जाती हैं। इसकी जड़ कब्ज है। इसलिए इस बवासीर रोग में सबसे पहला काम कब्ज को दूर करना है। बवासीर दो प्रकार की होती है, एक खूनी दूसरी वादी।
खूनी बवासीर में एकाएक रक्त को बन्द नहीं करना चाहिए। हाँ खून ज्यादा निकले और रोगी कमजोर होजाय तो बन्द कर देना चाहिए।
१—चूतड़ की हड्डी पर सींगी लगावे तो बवासीर को आराम हो।
२—एक बड़ी मूली लेकर खोखली कर लो और उसमें जितना ,
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बड़ी बड़ी बीमारियाँ
गूगल समा सके भर दो। फिर उसीके छिलके से बन्द करके डोरे से लपेटकर साफ भरती में गाढ़ दो और पत्ते तोड़ दो। समय समय पर पानी देते रहो दस पन्द्रह दिन में दुबारा पत्ते निकलेंगे तब उखाड़ मिट्टी दूरकर मूली और दवा घोट-पीसकर वेर के समान गोली बना लो। एक गोली सुबह एक शाम को खूनी में गर्मपानी से और बादी में ताजे से ला; फायदा होगा।
अगर बवासीर का दौरा हो रहा हो, दर्द, चमक खुल जारी हो तब यह दवा बनावे। गूगल तीन तोला नीम की निचोली तीन तोला, गुड़ पुराना तीन तोला कूट-पीटकर २२ गोली बनाओ एक सुबह एक शाम को ताजा पानी से लो। ११ दिन में फायदा हो जायगा।
३—अगर गुदा सूख गई हो, तकलीफ ज्यादा हो तो यह पुल-टिस बाँधो। भांग, हल्दी, पोस्त के डोडे, गुगल, प्रत्येक एक-एक तोला। बकरी का दूध दश तोला, दूध में लुगदी के समान पीस आग पर पुलटिस-सी पकाकर गर्ग-गर्मे बाँध दो। बहुत आराम मिलेगा।
४—क्रुञ्ज हो तो एनीमा दो।
५—जख्म हो गये हों तो यह भरहम लगाओ; छुरी या बन्दूक की गोली, या सीसे का टुकड़ा लेकर ताजा सकखन में घिसकर नीलेखा का भरहम बनालो। आवदस्त के बाद जंगली से अच्छी तरह यह भरहम लगाओ। तुरन्त ठण्डक पड़ेगी।
बवासीर के बीमार को मूली, वधुवा, जमीकन्द, गाजर और छाछ फायदा करती है।
सुगम चिकित्सा
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यह बहुत घुरी बीमारी है। इस में आँतों में खराबी पैदा हो जाती है और खाया हुआ पदार्थ ज्यों-का-त्यों निकल जाता है।
कभी-कभी तो २० से ३० तक दस्त दिन-रात में संग्रहण्यो होते हैं, पर कभी-कभी सिधे-सिधे ही दस्त होते हैं। पर बहुत भारी और कच्चे दस्त के बाद रोगी सुस्त और कमजोर होजाता है, खून की कमी हो जाती है। और फिर हाथ पैर और सर्वाङ्ग में सूजन आजाती है। और तब रोग असाध्य हो जाता है। रोग शुरू होते ही अच्छे चिकित्सक का इलाज कराना चाहिए। रोगी को पलंग पर लेटे रहना चाहिए। टट्टी भी लेटे-लेटे ही करनी चाहिए।
इस रोगी को सिर्फ़ गाय की छाछ या दही या गाय का फोका का दूध ही दिया जा सकता है। अन्न बिल्कुल बन्द कर देना चाहिए; जैसे दुखती आँख में रेत डाल देने से कष्ट होता है उसी भाँति इस रोग में अन्न खाने से कष्ट होता है, क्योंकि आँतें सूजी हुई रहती हैं। और उनमें घाव हो जाते हैं।
यद्यपि इस रोग का इलाज कठिन है फिर भी यहाँ हम एक बहुत उम्दा नुसखा लिखते हैं—
१—शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक दो तोला, सोंठ, मिर्च, पीपल प्रत्येक तीन-तीन तोला, हींग एक तोला। सबके वजन के बराबर भाँग, जो धोकर सुखाकर साफ़ कर ली गई हो, सबको कूट-छानकर चूर्ण कर लेना चाहिए। इस चूर्ण की मात्रा एक मासो से दो मासो तक है। दिन में ३ बार ताजा गाय की छाछ देना
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. वही-वही बीमारियाँ .
चाहिए। सिर्फ छाछ ही पीने को देना, और सब अन्न-जल बन्द करना चाहिए। रोग चाहे कैसा ही बढ़ गया हो फायदा हो जायगा। इस दवा में गन्धक पारा शुद्ध लिखा है—सो इन चीजों को शोधने की विधि अन्यत्र है, उसीके अनुसार शोधना चाहिए। आराम होने पर भी रोगी को परहेज कर खाना खाना चाहिए—खासकर मिठाई से बचना चाहिए।
रुखा, ठण्डा और खराब खाना बहुत दिन तक खाने से यह रोग होता है। कभी-कभी चोट लगने, गठिया वाय और लकूआ गर्मी की बीमारी होने और अन्य कारणों से भी यह बीमारी होती है। इसके बहुत भेद हैं। हम सिर्फ मोटी-मोटी बातें लिखेंगे।
गठिया-वाय में हाथ-पैरों के जोड़ों में पहले दर्द रहता है फिर वे जकड़ जाते हैं और फिर बड़ा कष्ट होता है। इसका एक बहुत अच्छा नुसखा यहाँ हम लिखते हैं—
१—एक तोला संखिया, एक तोला अक्रकरा, एक तोला लोंग और १०० बड़ला पान। तीनों दवाइयों को खरल में डालकर कूटना शुरू करो। एक-एक पान डालते जाओ, जब सब पान घुट जायें, मोठ के समान गोली बनालो। एक गोली सुबह एक शाम को गर्म पानी या दूध के साथ देना। तर पुष्टिकर भोजन करना। मूंग की दाल न खाना। गर्मी करे तो घी ज्यादा खाना। यह इस बीमारी की बहुत कारगर दवा है।
२—भिलावा १० नग, धतूरे का पूरा पेड़ एक, सीठा तेलिया
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१० तोला, मीठा तेल आध सेर, मालकगनी १० तोला सबको आग पर पकाओ। जब भिलावे जलकर तैरने लगें तब उतारलो इस तेल की मालिश से सब किसम का बादी का दर्द आराम होता है। यह तेल मुँह-आँख में न लगना चाहिए।
लकुए की बीमारी का इलाज आसान नहीं है। ज्यादा दिन न घुलाकर जल्द ही उसका इलाज करना चाहिए। रोगी को खूब आराम से रखना चाहिए। लकुआ दो किसम का होता है, एक दाएँ से बाँया आँख अङ्ग का, दूसरा ऊपर या नीचे के धड़ का।
१—उर्दू, कौच की जड़, अरएड की जड़ और खरेटी इनको ६-६ माशा लेकर एक पाव पानी में काढ़ा करना। इसमें एक माशा हींग और एक माशा सैन्धा नमक मिलाकर पिलाता। अगर किसी का मुँह टेढ़ा होगया हो तो लहसन कूटकर मक्खन के साथ खाने से फ़यदा होता है।
२—१५ कुचलों को १५ दिन पानी में भिगोवे, तीसरे दिन पानी बदलता रहे। १५वें दिन जब नरम होजायें छीलकर सुखाले, और आँख में भस्म करले, जब धुआ न रहे, तो पानी में काली मिर्च के समान गोली बनाये। एक-एक गोली रोज़ खाय। लकुआ, अधर्झवात और कमर के दर्द को फ़ायदा करे, ठण्डी प्रकृति को गरम करे।
कोढ़ की बीमारी दूसरे कोढ़ी के छूत से लगती है। यह रोग कीड़ों द्वारा पैदा होता है। शुरु में इस रोग में सिर दर्द और शरीर के भिन्न-भिन्न अङ्गों में दर्द होता है, ठण्ड लगती है और बदन सुन्न
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बड़ी-बड़ी बीमारियाँ
हो जाता है। पसीना ज्यादा आता है। पसीना या तो सारे शरीर में या एक अङ्ग में होता है। चेहरे और दूसरे अङ्गों में दाने निकल आते हैं। दाढ़ में माथे में, गालों में, नाक में, कान में, आँठों में गांठें पड़ जाती हैं, डाढ़ी-मूँछ और पलकों के बाल भड़ जाते हैं। और अन्त में पलकें, नाक, उँगलियाँ, अँगूठे और शरीर के और-और भाग सड़कर गिर पड़ते हैं।
दूसरे प्रकार के कोढ़ में चमड़ी सुन्न हो जाती है। इसमें पहले हाथों और टांगों में तेज दर्द होता है, पीछे चमड़ी पर धन्ने दीखते हैं, वे पहले लाल और पीछे सफेद हो जाते हैं। बाल भड़ जाते हैं, ऊँगलियाँ पड़ जाती हैं, कुछ दिन बाद नसें सुन्न हो जाती हैं, उँगलियाँ-अँगूठे और शरीर के दूसरे अङ्ग सड़कर भड़ जाते हैं।
मालूम होना चाहिए कि देश के हर सूवे में कहीं-न-कहीं सर्-कारी कोढ़ के अस्पताल बने हुए हैं। जहाँ कोढ़ के बीमारों को ठीक तौर पर रखकर उनका इलाज किया जाता है और कुछ खर्च भी नहीं होता। इस रोग के शुरू होते ही फौरन ही अस्पताल में बीमार को भेज देना चाहिए।
अगर ऐसा होना किसी कारण से मुमकिन न हो तो कोढ़ की सबसे बढ़िया दवा चोलमोगरे का तेल है जो किसी भी अच्छे अंग्रेजी दवा फ़रौश के यहाँ से मिल सकता है। इस तेल की आठ से बीस चूँद तक रोगी को मिश्री या वताशे में डालकर दिन में तीन बार बीमार को देना चाहिए। यह तैल साधारण खुजली से लेकर