भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 222 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 74

६२

कीड़ों की बीमारियाँ

इन कीड़ों से पैदा होता है आदमी दुबला और पीक पड़ जाता है, ताकत कम हो जाती है और तपेदिक होने का खतरा हो जाता है। बच्चे, जिनके पेट में कद्दूदाने होते हैं, छोटे ही रहते हैं और उनकी बढ़ावार रुक जाती है, वे १८ वीस वर्ष की उम्र में १०-१२ वर्ष के बालक से लगते हैं।

अगर तुम यह देखो कि किसी बालक की चमड़ी पीली पड़ गई है, वह सुस्त हो गया है और उसे चूना या मिट्टी रखने की इच्छा होती है तो जान लो कि इसके पेट में कद्दूदाने की बीमारी है। पाँव के तलुए और अँगूठों के बीच में खुजली चलने से यह समझना चाहिए कि कद्दूदाने पैर की चमड़ी के जरिये शरीर में घुस रहे हैं।

ये कद्दूदाने पेट में अनगिनत अण्डे देते हैं, पाखाने के साथ ये बाहर निकलते हैं, जब पाखाना इधर-उधर फँक दिया जाता है, तो ये भी फैल जाते हैं, १० दिन में इनमें से कीड़े निकल आते हैं, और घर के आँगन या बगीचे की मिट्टी में रेंगने लगते हैं। जो आदमी या बच्चे नंगे पैर चलते हैं उनके पैरों पर चढ़ जाते हैं और सौका पाकर चमड़ी में छेद करके भीतर घुस जाते हैं। और आँतों तक पहुँच जाते हैं। वहाँ मजे में खून चूसते रहते हैं।

इनके रोकने की सबसे अच्छी तरकीब यह है कि पक्के पाखानों को काम में लाया जाय, इधर-उधर मैला न फँका जाय। टह्रियों में ढकनेदार बालटियाँ हों, पाखाना दूर ले जाया जाय या गाड़ दिया जाय। अगर घर में पक्का पाखाना नहीं है तो

सुगम चिकित्सा · पृष्ठ 74, कुल 222 में से · BharatKosha