भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

॥ विपरीत ज्ञानी को अंग ॥ [ ६६ अथ बिपरीत ज्ञानी को अंग ॥१३॥ मनहर छंद 'एक ब्रह्म' मुख मौ बनाइ करि कहत है, अंतहकरन तौ बिकारनि सौ भर्यौ है । जैसैं ठग गोबर सौ कूपौ भरि राखत है, सेर पाच घृत लै के ऊपर ज्यौ कर्यौ है ॥ जैसे कोऊ भाडे माँहि प्याज कौ छिपाइ राखै, चीथरा कपूर कौ लै मुख बाधि धर्यौ है । सुन्दर कहत ऐसे ज्ञानी है जगत माहि, तिनकौ तौ देखि करि मेरौ मन डर्यौ है ॥१॥ देह सौ ममत्त पुनि गेह सौ ममत्त सुत, दारा सौ ममत्त मन माया मैं रहतु है । थिरता न लहै जैसै कदुक चौगान माहि, कर्मनि कै वसि मार्यौ थका कौ बहुतु है ॥ अंतहकरन मु तौ जगत सौ रचि रह्यौ, मुख सौ बनाइ बात ब्रह्म की कहतु है । सुन्दर अधिक मोही याही तै अचंभौ आहि, भूमि पर पर्यौ कोऊ चन्द कौ गहतु है ॥२॥ मुख सौ कहत ज्ञान, भ्रमै मन इन्द्रिय प्रान, मारग कै जल मैं न प्रतिबिंब लहिये ।