सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ गाठि मे न पैका कोऊ भयौ रहै साहूकार, बातनि ही मुहर रुपैया गिनि गहिये ॥ सुपने मैं पचामृत जीमि कै तृपति भयौ, जागै तै मरत भूख खाइबे कौ चहिये । सुन्दर सुभट जैसे काइर मारत गाल, राजा भोज सम कहा गगौ तेली कहिये ॥३॥ संसार के सुखनि सौ आसक्त अनेक विधि, इन्द्रिय हू लोलुप मन कबहू न गह्यौ है । कहत है ऐसै मै तो एक ब्रह्म जानत हू, ताहि तै छोडी कै शुभ कर्मन कौ रह्यौ है ॥ ब्रह्म की न प्राप्ति पुनि कर्म सब छूटि गये, दहुन तै भ्रष्ट होइ अधबिच बह्यौ है । सुन्दर कहत ताहि त्यागिये श्वपच जैसे, याही भांति ग्रन्थ मै वसिष्ठजी हू कह्यौ है ॥४॥ ज्ञान की सी बात कहै मन तौ मलीन रहै, वासना अनेक भरी नैकु न निवारि है । जैसे कऊ आभूषण अधिक बनाइ राख्यो, कलई ऊपरि करि भीतरि भगारि है ॥ ज्यौही मन आवै त्यौही खेलत निसंक होड, ज्ञान सुनि सीख लयौ ग्रथनि विचारि है । सुन्दर कहत वाकै अटक न कंऊ आहि, जोई वासौ मिलै जाइ ताहि कौ विगारि है ॥५॥