भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

॥ विपरीत ज्ञानी को अंग ॥ [ १०१ हंस श्वेत बक श्वेत देखिये समान दोऊ, हंस मोती चुगै बक मछरी कौ खात है । पिक अरु काक दोऊ कैसे करि जाने जाहि, पिक अंब डार काक करक हि जात है ॥ सिधौ अरु फटक पखान सम देखियत, वह तौ कठोर वह जल मैं समात है । सुन्दर कहत ज्ञानी बाहिर भीतर शुद्ध, ताकी पटतर और बातनि की बात है ॥६॥ ॥ इति विपरीत ज्ञानी को अंग सम्पूर्ण ॥ (१) कूपो-घड़ा, कलशा । (४) श्वपच-चांडाल । (६) पटतर-समान ।