भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

॥ बचन बिवेक को अंग ॥ [ १०५ बिबिध प्रकार करि बोलत जगत सब, घट घट मुख मख बचन अनैक है । सुन्दर कहत तातै बचन बिचारि लेहु, बचन तौ उहै जामै पाइये बिवेक है ॥८॥ जैसे हस नीर कौ तजत है असार जानि, सार जानि क्षीर कौं निरालौ करि पीजिये । जैसे दधि मथत मथत काढि लेत घृत, और रही पही सब छाछि छाडि दीजिये ॥ जैसे मधु मक्षिका, सुवास कौ भूमर लेत, तैसे ही बिचारि करि भिन्न भिन्नकीजिये । सुन्दर कहत तातै बचन अनेक भाँति, बचन मैं बचन विवेक करि लीजिये ॥६॥ प्रथम ही गुरुदेव मुख तै उचार कर्यो, वैई तौ बचन आइ लगे निज हीये हैं । तिनकौ बिवेक करि अन्तहकरन माहि, अति ही अमोल नग भिन्न भिन्न कीये हैं ॥ आपु कौ दरिद्र गयौ पर उपकार हेत, नग हि निगल कै उगलि नग दीये हैं । सुन्दर कहत यह वानी यौ प्रगट भई, और कोऊ सुनि करि रक जीव जीये है ॥१०॥