भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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१०६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ वचन तैं दूरि भिरै वचन चित्त होइ, वचन तैं राग बढ़ै, वचन तैं दोष जू । वचन तैं ज्वाला उठै, वचन सीतल होइ, वचन तैं मुदित, वचन ही तैं सोच जू ॥ वचन तैं प्यारौ लगे, वचन तैं दूरि भगे, वचन तैं सुम्भार वचन तैं पोच जू । सुन्दर कहत यह वचन ही भेद ऐसौ, वचन तैं बंध होइ, वचन तैं मोक्ष जू ॥११॥ वचन तैं गरु मित्र बाप पूत प्यारो होइ, वचन तैं बहु विधि होत उतपात हैं । वचन तैं नारी अरु पुरुष सनेह अति, वचन तैं दोऊ आपु आपु में रिसात हैं । वचन तैं नव आइ राजा के हजूरि होहि, वचन तैं चाकर ऊ छोड़ि कै परात हैं । सुन्दर सुवचन सुनत अति सुख होइ, कुबचन सुनत ही प्रीति घटि जात ह ॥१२॥ एक तौ वचन सुन कर्म ही मैं बहि जाहि, करत बहुत विधि सुरग की उमेद है । एक है वचन दिढ ईश्वर उपासना कै, तिनमैं तौ सकल ही वासना कौ छेद है ॥