सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
पृष्ठ 116, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 116
वचन विवेक को अंग ॥ [ १०७ एक है बचन तामैं एक ही अखंड ब्रह्म, सुन्दर कहत यौ बतायौ अ्रत वेद है । बचन अनेक ही प्रकार सब देखियत, बचन विवेक किये बचन मै भेद है ॥१३॥ बचन तै जोग करै, बचन तै जज्ञ करै, बचन तै तप करि देह कौ दहतु है । बचन तै बंधन करत है अनेक बिधि, बचन तै त्याग करि बन मैं रहतु है ॥ बचन तै उरझि रु सुरझै बचन ही तैं, बचन तै भांति भांति सकट सहतु है, बचन तै जीव भयौ बचन तै ब्रह्म होइ, सुन्दर बचन भेद बेद यौ कहतु है ॥१४॥ ॥ इति वचन विवेक को अ्रग सम्पूर्ण ॥ (१) ताजी-अरबी । तुरकीन-घोडा । (५) अ्रशम-अश्म, पत्थर । (६) रासभ-गधा । सारो-सारिका, मैना । रव-शब्द । रौन-रमणीय, सुन्दर । पौन-प्राणवायु ।