भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

१०८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ निर्गुण उपासना को अंग ॥१५॥ इन्द्रवज्रा ब्रह्मा कुलाल रचै बहु भाजन, कर्मनि के दधि मोहि न भावै । विष्नु हू मकट आठ गहै सब, ताहू कौ रक्षक काहु मनावै ॥ संकर भूत पिषाचनि के पति, पानि कपाल लिये बिललावै । ताहि तें सुन्दर निरगुन त्यागि सु, निर्मल एक निरंजन ध्यावै ॥१॥ कोटिक बात बनाइ कहै कहा, होत भया सब ही मन रंजन । शास्तर स्मृति वेद पुरान, बखानत है अतिशै लुक अंजन ॥ पानी मैं बूडत पानी गहै कत, पार पहूचत है मति भजन । सुन्दर तौ लग आंधेकी जेवरी, जौलौं न ध्याइ है एक निरंजन ॥२॥ (१) कुलाल-कुम्हार की तरह । भाजन-बर्तन । पानि- पाणि, हाथ मे । (२) मति भजन मदमति मूर्ख ।