सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ निर्गुण उपासना को अंग ॥ [ १०६ मजन सो जु मनोमल मजन, सज्जन सो जु कहै गति गुझैं । गजन सो जु इन्द्रिय गहि गजत, रंजन सो जु बुझावै अबुझैं ॥ भजन सो जु भर्यौ रस माहि, बिदुज्जन सो कतहू न अरुझैं । व्यजन सो जु बढै रुचि सुन्दर, अजन सो जु निरंजन सुझैं ॥३॥ जा प्रभु तैं उतपत्ति भई यह, सो प्रभु है उर इष्ट हमारै । जो प्रभु है सबकें सिर ऊपरि, ता प्रभु कौ हम हू सिर धारै ॥ रूप न रेख अलेख अखंडित, भिन्न रहै सब कारिज सारै । नाम निरंजन है तिनकौ पुनि, सुन्दर ता प्रभु कै बलिहारै ॥४॥ जो उपजै बिनसै गुन धारत, सो यह जानहु अजन माया । आवै न जाइ मरै नहिं जीवत, अच्युत एक निरंजन राया ॥ ज्यो तरु तत्त रहै रस एक हि, आवत जात फिरै यह छाया ।