भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

११० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सो परब्रह्म सदा सिर उपरि, सुन्दर सो प्रभु सो मन माना ॥५॥ जो उपज्यो कछु प्राह जरा लग, सो सब नाश निरंतर होई । रूप धर्यो जु रहै नहिं निश्चय, तीनों लोक सबै कहा होई ॥ राजस तामस सात्त्विक जागत, देखत काल सबै पुनि खोई । आपु हि एक रहै जु निरंजन, सुन्दर के मन मानत सोई ॥६॥ देवनि के सिर देव विराजत, ईश्वर के सिर ईश्वर कहिये । लालनि के सिर लाल निरंतर, खूबन के सिर खूब सु लहिये ॥ पावनि के सिर पाक शिरोमणि, देखि विचारि उहै दृढ गहिये । सुन्दर एक सदा सिर ऊपरि, और कछू हमकौं नहिं चहिये ॥७॥ शेष महेश गणेश जहां लग, विष्णु विरंचिहु के सिर स्वामी ।