सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ पतिव्रता को अंग ॥१६॥ द्विपद छंद आन की ओर निहारत ही जगै, जान पतिव्रत एक अनी को । ऐन अनादर ऐसी हि भांति जु, सीस फिरै पुनि शूर मनी को ॥ बैठिहि मैं हरवो कहै जान, घिनै अथ बिद ज्यों जोग जती की । गभ हृदै नै गयै जन सुन्दर, एक रती बिन एक अनी ही ॥१॥ जो हरि को तजि आन उपासत, सो मतिमंद फजीहति होई । ज्यो अपने भरतार हि छाडि, भई विभचारिनि कामिनि कोई ॥ सुन्दर ताहि न आदर मान, फिरै विमुखी अपनी पत खोई । बूडि मरै किनि कूप मझारि, कहा जग जीवत है शठ सोई ॥२॥ (१) हरवा-पतित । घिर्म-गिन्न से । (२) भत्तार-भर्ता पनि । पत-इज्जत ।