सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ पतिव्रता को अग ॥ [ १२३ एक सही सबकै उरि अन्तर, ता प्रभु को कहि काहे न गावै । सकट माहि सहाइ करै पुनि, सो अपनी पति क्यों बिसरावै ॥ चारि पदारथ और जहां लग, आठहु सिद्धि नवै निधि पावै । सुन्दर छारि परी तिनकै मुख, जो हरि को तजि आनहि ध्यावै ॥३॥ पूरन काम सदा सुख धाम, निरजन राम सिरज्जनहारौ । सेवक होइ रह्यौ सबकौ नित, कु जर कीट हि देत अहारौ ॥ भजन दुख दरिद्र निवारन,
- चित करै पुनि संझ सवारौ । ऐसौ प्रभू तजि आन उपासत, सुन्दर व्है तिनकौ मुख कारौ ॥४॥ होइ अनन्य भजै भगवत हि, और कछू उरि मैं नर्हि राखै । देवी ऊ देव जहा लग है, डरि के तिनसौ कहुं दीन न भाखै ॥ (३) छारि-राख, धूल । (५) हलाहल-सबसे भयकर विष ।