सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
॥ पतिव्रता को अग ॥ [ १२३ एक सही सबकै उरि अन्तर, ता प्रभु को कहि काहे न गावै । सकट माहि सहाइ करै पुनि, सो अपनी पति क्यों बिसरावै ॥ चारि पदारथ और जहां लग, आठहु सिद्धि नवै निधि पावै । सुन्दर छारि परी तिनकै मुख, जो हरि को तजि आनहि ध्यावै ॥३॥ पूरन काम सदा सुख धाम, निरजन राम सिरज्जनहारौ । सेवक होइ रह्यौ सबकौ नित, कु जर कीट हि देत अहारौ ॥ भजन दुख दरिद्र निवारन,
- चित करै पुनि संझ सवारौ । ऐसौ प्रभू तजि आन उपासत, सुन्दर व्है तिनकौ मुख कारौ ॥४॥ होइ अनन्य भजै भगवत हि, और कछू उरि मैं नर्हि राखै । देवी ऊ देव जहा लग है, डरि के तिनसौ कहुं दीन न भाखै ॥ (३) छारि-राख, धूल । (५) हलाहल-सबसे भयकर विष ।
११४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जोग हु जज्ञ ब्रतादि क्रिया, तिनकौ नहिं तौ सुपिने अभिलाखै । सुन्दर अमृत पान कियौ तब, तौ कहि कौन हलाहल चाखै ॥५॥ मनहर छंद काहे की फिरत नर भटकत ठौर ठौर, डागुलै की दौर देवी देव सब जानिये । योग यज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि दान, तिनहू कौं फल सोऊ मिथ्याई वखानिये ॥ सकल उपाय तजि, एक राम नाम भजि, याहि उपदेश सुनि हृदै माहि आनिये । नाहि तैं समुझि करि सुन्दर विश्वास धरि, और कोऊ कहै कछु ताकी नहिं मानिये ॥६॥ पति ही सौ प्रेम होइ, पति ही सौ नेम होइ, पति ही सौं क्षेम होइ, पति ही सौं रत है । पति ही है यज्ञ योग, पति ही है रस भोग, पति ही है जप तप, पति ही कौ यत है ॥ पति ही है ज्ञान ध्यान, पति ही है पुन्य दान, पति ही है तीर्थ न्हान, पति ही कौ मत है । पति बिन पति नाहिं, पति बिन गति नाहिं, सुन्दर सकल बिधि एक पतिब्रत है ॥७॥
॥ पतिव्रता को अंग ॥ [ ११५ जल कौ सनेही मीन विछुरत तजै प्रान, मनि बिन अहि जैसे जीवत न लहिये । स्वाति बूंद के सनेही प्रगट जगत माहि, एक सीप दूसरौ सु चातक ऊ कहिये ॥ रवि कौ सनेही पुनि कमल सरोवर मैं, शशि कौ सनेही ऊ चकोर जैसे रहिये । तैसै ही सुन्दर एक प्रभु सौं सनेह जोरि, और कछु देखि काहू ओर नहिं बहिये ॥८॥ ॥ इति पतिव्रता को अङ्ग सम्पूर्ण ॥
११६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ विरहनी उलाहने को अंग ॥१७॥ मनहर छव पिय को अदेगो भारी तोसो कही सुनि प्यारी, यारी तोरि गये मु नौ अजहू न आये हैं । मेरे तो जीवन-प्रान निस दिन उहै ध्यान, मुख सों न कहू आन, नैन भर लाये हैं ॥ जब तें गये बिछोहि नल न परत मोहि, ताते हू पूछत तोहि किन विरमाये है । सुन्दर विरहनि कै सोच मखी वार वार, हमको विसारि अब कीन के कहाये हैं ॥१॥ हमको तौ रैनि दिन शक मन माहि रहै, उनकी तौ बातनि मैं ठीक हू न पाइये । कवहू सदेसौ सुनि अधिक उछाह होइ, कबहू क रोइ रोइ आसुनि बहाइये ॥ औरनि के रस वस होइ रहे प्यारे लाल, आवनि की कहि कहि हमकौं सुनाइये । सुन्दर कहत ताहि काटिये जु कौन भांति, जो तौ रुख आपने हाथ से लगाइये ॥२॥ (१) अदेसो-आश्चर्य ।
॥ विरहनी उलोहने को अंग ॥ [ ११७ मोसौ कहै औरसी ही, वासौ कहै औरसी ही, जासौ कहै ताही के प्रतीति कैसे होत है । काहू कौ सभास करै, काहू सौ उदास फिरै, काहू सौ तौ रस बस एकमेक पोत है ॥ दगाबाजी दुबिध्या तौ मन की न दूरि होइ, काहू कै अधेरौ घर, काहू कै उद्योत है । सुन्दर कहत जाकै पीर सो करै पुकार, जाकै दुख दूरि गयौ ताकै भई वोत है ॥३॥ हीये और जीये और लीये और दीये और, कीये और कौनऊ अनूप पाटी पढै है । मुख और बैन और नैन और सैन और, तन और मन और जत्र माहिं कढै है ॥ हाथ और पाव और सीसहू श्रवन और, नख सिख रोम रोम कलई सौ मढे है । ऐसो तौ कठोरता सुनी न देखी जगत मैं, सुन्दर कहत काहू बज्र ही के गढै हैं ॥४॥ भई हू अति बावरी विरह घेरी बावरी, चलत ऊचौ बावरी, परौंगी जाइ बावरी । (३) वोत-सुख शान्ति ।
११८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ फिरत हौं उतावरी लगत नहिं तावरी, मु वाही की बनावरी चल्यौ है जात नाव री ॥ थके हैं दोउ पांव री, चटत नहिं पाव री, पियागे नहिं पाव री, जहर वाटि पाव री । दीरत नहिं नावरी, पुकारि कै सुनाव री, सुन्दर कोउ नावरी, डूबत राखै नाव री ॥५॥ ॥ इति विरहनी उलाहने को अंग सम्पूर्णं ॥ (५) बावरी-बावली, पागल । बाव-वायु, श्वास । तावरी-तावडी, धूप । उतावरी-उतावली । पावरी-पावडी ।
॥ शब्द सार को अंग ॥ [ ११६ अथ शब्द सार को अंग ॥१८॥ मनहर छंद भूल्यौ फिरै भ्रम तै करत कछु और और, करत न ताप दूरि, करत सताप कौ । दक्ष भयौ रहै पुनि दक्ष प्रजापति जैसे, देत परदक्षिनां, न दक्षिना दे आपकौ ॥ सुन्दर कहत ऐसे जानै न जुगति कछु, और जाप जपै, न जपत निज जाप कौ । बाल भयौ युवा भयौ बय बीतै बृद्ध भयौ, बपुरूप होई कै बिसरि गयौ बाप कौ ॥१॥ इन्दव छंद पांन उहै जु पीयूष पिवै नित, दांन उहै जु दरिद्र ही भानै । कान उहै सुनिये जश केशव, मान उहै करिये सनमानै ॥ तान उहै सुलतान रिझावत, जान उहै जगदीश ही जानै । बान उहै मन बेधत सुन्दर, ज्ञान उहै उपजै न अज्ञानै ॥२॥ (१) वय-अमर । बपु-शरीर । सुलतान-परमेश्वर ।
१२० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सूर उहै मन कौ बमि राखत, कूर उहै रन माहिं नर्ज है । त्याग उहै अनुगग नही कहु, भाग उहै मन मोह तजै है ॥ तज्ञ उहै निज तत्त्वनि जानत, यज उहै जगदीश यजै है । रत्त उहै सौ रत सुन्दर, भक्त उहै भगवत भजै है ॥३॥ चाप उहै कसिये रिपु ऊपरि, दाप उहै दलकारि ही मारै । छाप उहै हरि आप दई सिर, थाप उहै थपि और न धारै ॥ जाप उहै जपिये अजपा नित, खाप उहै निज खाप विचारै । बाप उहै सबकी प्रभु सुन्दर, पाप हरै अरु ताप निवारै ॥४॥ (३) तज्ञ-तत्त्वज्ञ, ज्ञानी । (४) खाप-जाति ।
॥ शब्द सार को अंग ॥ [ १२१ भौन उहै भय नाहि न जा महिं, गौन उहै फिर होइ न गौंना । वौन उहै बमिये विषया रस, रौन उहै प्रभु सौं नित रौना ॥ मौन उहै जु लिये हरि बोलत, लोन उहै सब और अलौन। सौंन उहै गुरु सत मिलै जब, सुन्दर शक रहै नहिं कौना ॥५॥ कार उहै अविकार रहै नित, सार उहै जु असार हि नाखै । प्रीति उहै जु प्रतीति धरै उरि, नीति उहै जु अनीति न भाखै ॥ तत उहै लगि श्रत न टूटत, संत उहै अपनौ सत राखै । नाद उहै सुनि बाद तजैं सब, स्वाद उहै रस सुन्दर चाखै ॥६॥ (६) भौन-भवन, मकान । गौन-गमन । वौन-वमन, उल्टी । रौन-रोना । लोन-लवण, नमक । सौन-शकुन, सुगन ।
१२२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ श्वास उहै जु उशास न छाडत, नाश उहै फिरि होइ न नाशा । पास उहै सत पास लगै जम, पास कटै, प्रभु कै नित पासा । बास उहै गृह बास तजै, बनबास नही तिहि ठाहर बासा । दास उहै जु उदास रहै, हरिदास सदा कहि सुन्दरदासा ॥७॥ श्रोत्र उहै श्रुति सार सुनै नित, नैन उहैं निज रूप निहारै । नाक उहै हरि नाक हि राखत, जीभ उहै जगदीश उचारै ॥ हाथ उहै करिये हरि कौ कृत, पाव उहै प्रभु कै पथ धारै । शीस उहै करि श्याम समर्पण, सुन्दर यौ सब कारिज सारै ॥८॥ सोवत सोवत सोइ गयौ शठ, रोवत रोवत कै बर रोयौ । गोवत गोवत गोइ धर्यौ धन, खोवत खोवत ते सब खोयौ ॥ जीवत जोवत बीति गये दिन, बोवत बोवत लै बिख बोयौ ।
॥ शब्द सार को अंग ॥ [ १२३ सुन्दर सुन्दर राम भज्यौ नहिं, ढोवत ढोवत बोझ हि ढोयौ ॥६॥ देखत देखत देखत मारग, बूझत बूझत बूझत आयौ । सूझत सूझत सूझ परी सर्व, गावत गावत गोविंद गायौ ॥ सोधत सोधत शुद्ध भयौ पुनि, तावत तावत कंचन तायौ । जागत जागत जागि पर्यौ जब, सुन्दर सुन्दर सुन्दर पायौ ॥१०॥ ॥ इति शब्द सार को अंग सम्पूर्ण ॥
१२४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ सूरातन को अंग ॥१६॥ मनहर छंद सुनत नगारे चोट बिगसै कवल मुख, अधिक उछाह फूल्यौ माइ हू न तन मैं । फेरै जब सांगि तब कोऊ नहि धीर धरै, काइर कपाइमान होत देखि मन मैं ॥ टूटिकै पतंग जैसे परत पावक माहि, ऐसें टूटि परै बहु सावत के घन मैं । मारि घमसान करि सुन्दर जुहारै स्याम, सोई शूरबीर रुपि रहै जाइ रन मैं ॥१॥ हाथ मैं गह्यौ है खग, मरिबे कौ एक पग, तन मन आपनौ समरपन कीनौ है । आगे करि मीच कौ पर्यो है डाकि रन बिच, टूक टूक होइ कै भगाइ दल दीनौ है ॥ खाइ लौन श्याम कौ हरामखोर कैसे होइ, नामजाद जगत मैं जीत्यौ पन तीनौ है । सुन्दर कहत ऐसौ कोऊ एक शूरबीर, शीश कौ उतारिकै सुजस जाइ लीनौ है ॥२॥ (२) खग-खड्ग, तलवार । मीच-मौत । दल-शत्रु की सेना । सूरातन-शूरवीरता/
॥ सूरतान को अंग ॥ [ १२५ पांव रोपि रहे रन माहि रजपूत कोऊ, हय गय गाजत जुरत जहां दल है । बाजत भुझाऊ सहनाई सिंधू राग पुनि, सुनत ही काइर की छूटि जात कल है ॥ झलकत बरछी तरछी तरवारि बहै, मार मार करत परत खल भल है । ऐसे जुद्ध मैं अडिंग सुन्दर सुभट सोई, घर माहि सूरमा कहावत सकल है ॥३॥ अशन बसन बहू भूषण सकल अंग, सम्पति बिबिध भांति भर्यौ सब घर है । श्रवन नगारौ सुनि छिनक मैं छोड़ि जात, ऐसे नहि जाने कछू आगे मोहि मर है ॥ मन मैं उछाह रन माहि टूक टूक होइ, निरभै निशंक वाकै रचहू न डर है । सुन्दर कहत कोऊ देह कौ ममत्त नाहि, सूरमा कै देखियत शीश बिन धर है ॥४॥ जूझिबे कौ चाब जाकै ताकि ताकि करै घाव, आगे धरि पाव फिरि पीछे न सभारि है । हाथ लीये हथियार तीक्ष्ण लगायो धार, बार नहि लागै सब पिशुन प्रहारि है ॥ (४) अशन-भोजन ।
१२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ ओट नहि राखै कछु लोट पोट होइ जाइ, चोट नहिं चूकै, शीश रिपु कौ उतारि है । सुन्दर कहत ताहि नैकहू न सोच पोच, ऐसौ शूरवीर धीर मीर जाइ मारि है ॥५॥ अधिक अजानबाहु मन मैं उछाह कीये, दीये गजगाह मुख बरखत नूर है । काढै जब करवाल वाल सब ठाढे होहिं, अति बिकराल पुनि देखत करूर है ॥ नैक न उसास लेत फौज कौं फिटाइ देत, खेत नहिं छाडै मारि करै चकचूर है । सुन्दर कहत ताकी कीरति प्रसिद्ध होइ, सोई शूरबीर धीर श्याम के हजूर है ॥६॥ ज्ञान कौ कवच अग काहू सौं न होइ भग, टोप शीस झलकत - परम बिबेक है । तिन्है ताजी असवार लीये समसेर सार, आगे ही कौ पाव धरै भागणै की टेक है ॥ छूटत बदूक बाण बीचै जहा घमसान, - देखिकै पिशुन दल मारत अनेक है । सुन्दर सकल लोक माहि ताकौ जै जै कार, ऐसौ शूरबीर कोऊ कोटिन मैं एक है ॥७॥ (६) अजानबाहु-अजानवाहु-दीर्घबाहु, शूरवीर । कर- वाल-तलवार ।
॥ सूरतान् को अंग ॥ [ १२७ शूरबीर रिपु कौ नमूनौ देखि चौट करै, मारै तब ताकि करि तरवारि तीर सौ । साधु आठौ जाम बैठौ मन ही सौ युद्ध करै, जाकैं मुह माथौ नहिं देखिये शरीर सौ ॥ सूरबीर भूमि पर दौर करै दूरि लगै, साधु सुनि कौ पकरि राखै धरि धीर सौ । सुन्दर कहत तहा काहू के न पाव टिकै, साधु कौ संग्राम है अधिक शूरबीर सौ ॥८॥ खेचि करडी कमान ज्ञान की लगायो बान, मार्यौ महाबली मन जग जिन रान्यौ है । ताकै अगवानी पच जोधा ऊ कतल कीये, और रह्यौ पह्यौ सब अरि दल भान्यौ है ॥ ऐसौ कोऊ सुभट जगत मै न देखियत, जाकै आगै कालहू सौ कपिकै परान्यौ है । सुन्दर कहत ताकी शोभा तिहूं लोक माहि, साधु सौ न शूरबीर कोऊ हम जान्यौ है ॥६॥ काम सौ प्रबल महा जीते जिन तीनौ लोक, सो तौ एक साधु कै बिचार आगै हार्यौ है । क्रोध सौ कराल जाके, देखत न धीर धरै, सोउ साधु क्षमा कै हथ्यार सौ बिदार्यौ है ॥ लोभ सौ सुभट साधु तोष सौ गिराइ दियौ, मोह सौ नृपति साधु ज्ञान सौ प्रहार्यौ है ।
१२८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सुन्दर कहत ऐसो साधु कोऊ शूरबीर, ताकि ताकि सबहि पिगुन दल मार्यौ है ॥१०॥ मारे काम क्रोध जिन, लोभ मोह पीसि डारे, इन्द्रिय कतल करि कीयौ रजपूतौ है । मार्यौ मदमत्त मन, मार्यौ अहंकार मीर, मारे मद मछर ऊ ऐसौ रन रूतौ है ॥ मारि आशा तृष्णा जिन पापनी सापनी दोऊ, सबकौ प्रहारि निज पद ई पहूतौ है । सुन्दर कहत ऐसैं साधु कोऊ शूरवीर, वैरी सब मारि कैं निश्चित होई सूतौ है ॥११॥ कियौ जिन मन हाथ इन्द्रिनि कौ सब साथ, घेरि घेरि आपने ई नाथ सौं लगाये हैं । और हू अनेक वैरी मारे सब युद्ध करि, काम क्रोध लोभ मोह खोदिकै बहाये हैं ॥ किये हैं संग्राम जिन दिये हैं भगाइ दल, ऐसैं महा सुभट सुग्रन्थनि मैं गाये हैं । सुन्दर कहत और शूर याँ ही खपि गये, साधू शूरवीर वै ई जगत मैं आये हैं ॥१२॥
॥ सूरातन को अंग ॥ [ १२६ महामत्त हाथी मन राख्यो है पकरि जिन, अति ही प्रचंड जामैं बहुत गुमान है । काम क्रोध लोभ मोह बाधे चारौ पांव पुनि, छूटनै न पावै नैक प्रान पीलवान है ॥ कबहू जो करै जोर सावधान साझ भोर, सदा एक हाथ मैं अकुश गुरु ज्ञान है । सुन्दर कहत और काहू कै न बसि होइ, ऐसे कौन शूरबीर साधू के समान हैं ॥१३॥ ॥ इति सूरातन को अंग सम्पूर्ण ॥
१३० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ साधु को अंग ॥२०॥ इन्दव छंद प्रीति प्रचंड लगै परब्रह्म हि, और सबै कछु लागत फीको । शुद्ध हृदै मति होइ सु निर्मल, द्वैत प्रभाव मिटै सब जी कौ ॥ गोष्ठि रु ज्ञान अनत चलै जह, सुन्दर जैसे प्रवाह नदी कौ । ताहि तं जानि करौ निसवासर, साधु कौ सग सदा अति नीकौ ॥१॥ जौ कोऊ जाइ मिलै उनसौ नर, होत पवित्र लगै हरि रंगा । दोष कलंक सबै मिटि जात सु, नीचहू आइकैं होत उतगा ॥ ज्यौं जल और मलीन महा अति, गंग मिले होइ जात है गंगा । सुन्दर शुद्ध करै ततकाल सु, है जग मांहि बडी सतसंगा ॥२॥ (१) द्वैत-भेदभाव । (२) उतगा-उत्तम, ऊचा ।
॥ साधु को अंग ॥ [ १३१ ज्यौं लट भृंग करै अपनै सम, तासनि भिन्न कहै नहिं कोई । ज्यौ द्रुम और अनेक हि भातिनि, चंदन के ढिग चंदन होई ॥ ज्यौ जल क्षुद्र मिलै जब गंगहि, होत पवित्र उहै जल सोई । सुन्दर जाति सुभाव मिटै सब, साधु कै संगतै साधु ही होई ॥३॥ जो कोउ आवत है उनके ढिग, ताहि सुनावत शब्द सदेसौ । ताहि कै तैसी ही औषध लावत, जाहि कै रोग ही जानत जैसौ । कर्म कलंक हि काटत है सब, शुद्ध करै पुनि कंचन तैसौ । सुन्दर वस्तु विचारत है नित, सतनि कौ जु प्रभाव है ऐसौ ॥४॥ (३) भृंग-भोरा । ढिग-पास । क्षुद्र-गंदा । (४) कंचन-सोना । ।
३. अंग ११-१५: पञ्च-कोश विवेक, सांख्य-वेदान्त विचार व ब्रह्म-दर्शन
१३२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जो परब्रह्म मिल्यौ कोऊ चाहत, तो नित सत समागम कीजै । अंतरि मेटि निरतर व्है करि, लै उनकौ अपनौ मन दीजै ॥ वै मुख द्वार उचार करै कछु, सो अनयास सुधा रस पीजै । सुन्दर सूर प्रकासत है उर, और अज्ञान सबै तम छीजै ॥५॥ जा दिन तें सतसंग मिल्यौ तब, ता दिन तें भ्रम भाजि गयौ है । और उपाइ थके सव ही जब, सतनि अद्वय ज्ञान दयौ है ॥ पोत पवारि हि क्यों करि छूवत, एक अमोलिक लाल लह्यौ है । कौन प्रकार रहै रजनी तम, सुन्दर सूर प्रकाश भयौ है ॥६॥ (५) अन्तर-भेद । अनयास-सरलता से । (६) अद्वय-अभेद । पोत पवार-काच के दाने ।