भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

॥ शब्द सार को अंग ॥ [ ११६ अथ शब्द सार को अंग ॥१८॥ मनहर छंद भूल्यौ फिरै भ्रम तै करत कछु और और, करत न ताप दूरि, करत सताप कौ । दक्ष भयौ रहै पुनि दक्ष प्रजापति जैसे, देत परदक्षिनां, न दक्षिना दे आपकौ ॥ सुन्दर कहत ऐसे जानै न जुगति कछु, और जाप जपै, न जपत निज जाप कौ । बाल भयौ युवा भयौ बय बीतै बृद्ध भयौ, बपुरूप होई कै बिसरि गयौ बाप कौ ॥१॥ इन्दव छंद पांन उहै जु पीयूष पिवै नित, दांन उहै जु दरिद्र ही भानै । कान उहै सुनिये जश केशव, मान उहै करिये सनमानै ॥ तान उहै सुलतान रिझावत, जान उहै जगदीश ही जानै । बान उहै मन बेधत सुन्दर, ज्ञान उहै उपजै न अज्ञानै ॥२॥ (१) वय-अमर । बपु-शरीर । सुलतान-परमेश्वर ।