भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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११८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ फिरत हौं उतावरी लगत नहिं तावरी, मु वाही की बनावरी चल्यौ है जात नाव री ॥ थके हैं दोउ पांव री, चटत नहिं पाव री, पियागे नहिं पाव री, जहर वाटि पाव री । दीरत नहिं नावरी, पुकारि कै सुनाव री, सुन्दर कोउ नावरी, डूबत राखै नाव री ॥५॥ ॥ इति विरहनी उलाहने को अंग सम्पूर्णं ॥ (५) बावरी-बावली, पागल । बाव-वायु, श्वास । तावरी-तावडी, धूप । उतावरी-उतावली । पावरी-पावडी ।