सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ विरहनी उलोहने को अंग ॥ [ ११७ मोसौ कहै औरसी ही, वासौ कहै औरसी ही, जासौ कहै ताही के प्रतीति कैसे होत है । काहू कौ सभास करै, काहू सौ उदास फिरै, काहू सौ तौ रस बस एकमेक पोत है ॥ दगाबाजी दुबिध्या तौ मन की न दूरि होइ, काहू कै अधेरौ घर, काहू कै उद्योत है । सुन्दर कहत जाकै पीर सो करै पुकार, जाकै दुख दूरि गयौ ताकै भई वोत है ॥३॥ हीये और जीये और लीये और दीये और, कीये और कौनऊ अनूप पाटी पढै है । मुख और बैन और नैन और सैन और, तन और मन और जत्र माहिं कढै है ॥ हाथ और पाव और सीसहू श्रवन और, नख सिख रोम रोम कलई सौ मढे है । ऐसो तौ कठोरता सुनी न देखी जगत मैं, सुन्दर कहत काहू बज्र ही के गढै हैं ॥४॥ भई हू अति बावरी विरह घेरी बावरी, चलत ऊचौ बावरी, परौंगी जाइ बावरी । (३) वोत-सुख शान्ति ।