भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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११६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ विरहनी उलाहने को अंग ॥१७॥ मनहर छव पिय को अदेगो भारी तोसो कही सुनि प्यारी, यारी तोरि गये मु नौ अजहू न आये हैं । मेरे तो जीवन-प्रान निस दिन उहै ध्यान, मुख सों न कहू आन, नैन भर लाये हैं ॥ जब तें गये बिछोहि नल न परत मोहि, ताते हू पूछत तोहि किन विरमाये है । सुन्दर विरहनि कै सोच मखी वार वार, हमको विसारि अब कीन के कहाये हैं ॥१॥ हमको तौ रैनि दिन शक मन माहि रहै, उनकी तौ बातनि मैं ठीक हू न पाइये । कवहू सदेसौ सुनि अधिक उछाह होइ, कबहू क रोइ रोइ आसुनि बहाइये ॥ औरनि के रस वस होइ रहे प्यारे लाल, आवनि की कहि कहि हमकौं सुनाइये । सुन्दर कहत ताहि काटिये जु कौन भांति, जो तौ रुख आपने हाथ से लगाइये ॥२॥ (१) अदेसो-आश्चर्य ।