सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ पतिव्रता को अंग ॥ [ ११५ जल कौ सनेही मीन विछुरत तजै प्रान, मनि बिन अहि जैसे जीवत न लहिये । स्वाति बूंद के सनेही प्रगट जगत माहि, एक सीप दूसरौ सु चातक ऊ कहिये ॥ रवि कौ सनेही पुनि कमल सरोवर मैं, शशि कौ सनेही ऊ चकोर जैसे रहिये । तैसै ही सुन्दर एक प्रभु सौं सनेह जोरि, और कछु देखि काहू ओर नहिं बहिये ॥८॥ ॥ इति पतिव्रता को अङ्ग सम्पूर्ण ॥