भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

१२४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ सूरातन को अंग ॥१६॥ मनहर छंद सुनत नगारे चोट बिगसै कवल मुख, अधिक उछाह फूल्यौ माइ हू न तन मैं । फेरै जब सांगि तब कोऊ नहि धीर धरै, काइर कपाइमान होत देखि मन मैं ॥ टूटिकै पतंग जैसे परत पावक माहि, ऐसें टूटि परै बहु सावत के घन मैं । मारि घमसान करि सुन्दर जुहारै स्याम, सोई शूरबीर रुपि रहै जाइ रन मैं ॥१॥ हाथ मैं गह्यौ है खग, मरिबे कौ एक पग, तन मन आपनौ समरपन कीनौ है । आगे करि मीच कौ पर्यो है डाकि रन बिच, टूक टूक होइ कै भगाइ दल दीनौ है ॥ खाइ लौन श्याम कौ हरामखोर कैसे होइ, नामजाद जगत मैं जीत्यौ पन तीनौ है । सुन्दर कहत ऐसौ कोऊ एक शूरबीर, शीश कौ उतारिकै सुजस जाइ लीनौ है ॥२॥ (२) खग-खड्ग, तलवार । मीच-मौत । दल-शत्रु की सेना । सूरातन-शूरवीरता/