सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१३२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जो परब्रह्म मिल्यौ कोऊ चाहत, तो नित सत समागम कीजै । अंतरि मेटि निरतर व्है करि, लै उनकौ अपनौ मन दीजै ॥ वै मुख द्वार उचार करै कछु, सो अनयास सुधा रस पीजै । सुन्दर सूर प्रकासत है उर, और अज्ञान सबै तम छीजै ॥५॥ जा दिन तें सतसंग मिल्यौ तब, ता दिन तें भ्रम भाजि गयौ है । और उपाइ थके सव ही जब, सतनि अद्वय ज्ञान दयौ है ॥ पोत पवारि हि क्यों करि छूवत, एक अमोलिक लाल लह्यौ है । कौन प्रकार रहै रजनी तम, सुन्दर सूर प्रकाश भयौ है ॥६॥ (५) अन्तर-भेद । अनयास-सरलता से । (६) अद्वय-अभेद । पोत पवार-काच के दाने ।