सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ साधु को अंग ॥ [ १३३ संत सदा सब कौ हित वांछत, जानत है नर बूडत काढै । दे उपदेश मिटाइ सबै भ्रम, ले करि ज्ञान जिहाज ही चाढै ॥ जे विषिया सुख नाहिन छाड़त, ज्यौ कपि मूठि गहै शठ गाढ ॥ सुन्दर यौ दुख कौ सुख मानत, हाट ही हाट विकावत आढै ॥७॥ सो अनयास तिरै भवसागर, जो सतसंगति मैं चलि आवै । ज्यो कनिहार न भेद करै कछु, आइ चढै तिहि नाव चढावै ॥ ब्राह्मन क्षत्रिय वैश्य हू शूद्र, मलेच्छ चंडाल ही पार लगावै । सुन्दर बार कछू नही लागत, या नर देह अभै पद पावै ॥८॥ ज्यौं हम खाहि पिवै अरु बोढहिं, तैसे ही ये सब लोग वखानैं । ज्यौं जलमैं शशिकै प्रतिबिंव ही, आप समा जल जत प्रवानैं ॥ (८) कनिहार-कर्णधार, केवट ।