सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ साधू को अग ॥ [ १३५ तात मिलै पुनि मात मिलै, सुत भ्रात मिलै युवती सुखदाई । राज मिलै गज बाज मिलै, सर्ब साज मिलै मन वांछित पाई ॥ लोक मिलै सुरलोक मिलै, बिधिलोक मिलै बैकुण्ठ हि जाई । सुन्दर और मिलै सबही सुख, दुर्लभ सत समागम भाई ॥१२॥ मनहर छन्द देव हू भये तै कहा, इन्द्र हू भये तै कहा, विधि हू कै लोक तै बहुरि आइयतु है । मानुष भये तै कहा भूपति भये तै कहा, द्विज हू भये तै कहा पार जाइयतु है ॥ पशु हू भये तै कहा पखी हूं भये तै कहा, पन्नग भये तै कहौ क्यौं अघाइयतु है । छूटिबे कौ सुन्दर उपाइ एक साधु सग, जिनकी कृपा तै अति सुख पाइयतु है ॥१३॥ (१२) तात-पिता । (१३) विधि-ब्रह्मा । पन्नग-सर्प ।