सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ इन्द्राणी शिगार करि चंदन लगायौ अंग, वाही देखि इन्द्र अति काम बस भयौ है । शूक़री हू कर्द्दम कै चहले मैं लौटि करि, आगै जाइ शूकर कौ मन हरि लयौ है ॥ जैसौ सुख शूकर कौ तैसौ सुख मधवा कौ, तैसौ सुख नर पशु पखिन कौ दयौ है । सुन्दर कहत जाकै भयौ ब्रह्मानंद सुख, सोई साधु जगत मैं जन्म जीति गयौ है ॥१४॥ धूलि जैसौ धन जाकै शूलि से ससार सुख, भूलि जैसी भाग देखै अन्त की सी यारी है । पाप जैसी प्रभुताई साप जैसी सनमांन, वडाई हू बिछुनी सी नागनी सी नारी है । अग्नि जैसौ इन्द्रलोक विघ्न जसौ विधिलोक, कीरति कलंक जैसी सिद्धि सी ठगारि है । वासना न कोऊ वाकी ऐसी मति सदा जाकी, सुन्दर कहत ताहि वदना हमारी है ॥१५॥ (१४) शृंगार-सजावट । कर्दम-कीचट । चहले में- खड्डे में । शूकर-सूअर । मधवा-इन्द्र ।