भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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पृष्ठ 147

१३८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जैसे आरसी कौ मैल काटत सिकलीगर, मुख मै न फेर कोऊ वहै वाकौ पोत है । जैसे बैद नैन मैं, सलाका मेलि शुद्ध करै, पटल गये ते तहाँ ज्यौ की त्यौ ही जोत है ॥ जैसे वायु बादर बिखेरि कै उडाइ देत, रवि तौ अकास माहि सदा ई उदोत है । सुन्दर कहत भ्रम छिन मैं बिलाइ जात, साधु ही कै सग तै स्वरूप ज्ञान होत है ॥१८॥ मृतक दादुर जीव सकल जिवाये जिन, बरखत बानी मुख मेघ की सी धार कौ । देत उपदेश, कोऊ स्वार्थ न लंवलेश, निश दिन करत है ब्रह्म ही बिचारे कौ ॥ और हू सदेह सब मेटत निमिष माहि, सूरज मिटाइ देत जैसे अधकार कौ । सुन्दर कहत हस बासी सुख सागर के, सतजन आये है सु पर उपकार कौ ॥१६॥ (१८) आरसी-काच, दर्पण । पोत-सफाई । सलाका- शलाका-सलाई । उदोत-प्रकाशमान । (१६) मृतक-मरा हुआ । दादुर-मेढक । निमिष-क्षण ।