सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ प्रथम सुजश लेत शील हू सतोष लेत, क्षमा दया धर्म लेत पापतैं डरतु हैं । इन्द्रिनि कौ घेरि लेत, मनहू कौ फेर लेत, जोग की जुगति लेत ध्यान लै धरतु है ॥ गुरु कौ बचन लेत, हरिजी कौ नाम लेत, आतमा कौ सोधि लेत भौजल तिरतु हैं । सुन्दर कहत जग सत कछु लेत नाहि, सतजन निस दिन लेबौई करतु है ॥२२॥ साचौ उपदेश देत भली भली मोख देत, समता सुबुद्धि देत कुमति हरत है । मारग दिखाइ देत भाव हू भगति देत, प्रेम की प्रतीति देत अभरा भरत हैं ॥ ज्ञान देत ध्यान देत आतमा बिचार देत, ब्रह्म कौ बताइ देत ब्रह्म मैं चरत है । सुन्दर कहत जग सत कछ देत नाहि, सतजन निश दिन देबौई करत है ॥२३॥ (२२) भौजल-भवजल, ससार-सागर । (२३) प्रतीति-भाव । अभरा-अपूर्ण, खाली । ब्रह्म मे चरत है-स्वय ब्रह्मानन्द मे विहार करते है,