भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 284 में से

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॥ साधु को अंग ॥ [ १४१ जगत ब्यौहार सब देखत है ऊपरि कौ, अन्तहकरन कौ न नैक पहिचानि है । छाजन कै भोजन कै हलन चलन कछु, और कोऊ क्रिया करै सोई तौ बखानि है ॥ आपुनेई गुननि आरोपत अज्ञानी नर, सुन्दर कहत तातै निदाई कौ ठानि है । भाव मैं तौ अन्तरि है राति अरु दिन कौ सौ, साधु की परीक्षा कोऊ कैसे करि जानि है ॥२४॥ कूप मैं कौ मीडूका तौ कूप कौ सराहत है, राजहंस सौ कहै कितौक तेरी सर है । मशका कहत मेरी सरभरि कौन उडै, मेरै आगै गरुड की कितीयक जर है ॥ गुबरेला गोली कौ लुढाई करि मानै मोद, मधुप कौ निंदत सुगंध जाकौ घर है । आपुनि न जानै गति सतन की नाम धरै, सुन्दर कहत देखौ ऐसौ मूढ नर है ॥२५॥ (२४) छाजन-छादन, वस्त्र । (२५) मशक-मच्छर । सरभरि-बराबर । जर-शक्ति, ताकत । गुबरेला-गोबर की गोली बनाने वाला जानवर । मधुप-भौरा ।

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