भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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१४२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ कोऊ साध भजनीक हुतौ लयलीन अति, कबहू प्रारब्ध कर्म धक्का आइ दयौ है । जैसे कोऊ मारग मैं चलतै आखुटि परै, फेरि करि उठै तब उहै पथ लयौ है ॥ जैसे चन्द्रमा की पुनि कला क्षीन होइ गई, सुन्दर सकल लोक दुतीया कौ नयौ है । देव कौ देवातन गयौ तौ कहा भयौ बीर, पीतर कौ मोल सु तौ नहि कछु गयौ है ॥२६॥ उही दगाबाज उही कुष्ठी जु कलंक भयौ, उही महापापी वाकैं नख सिख कीच है । उही गुरुद्रोही, गो ब्राह्मण कौ हननहार, उही आतमा कौ घाती हिंसा वाकै बीच है ॥ उही अघ कौ समुद्र उही अघ कौ पहार, सुन्दर कहत वाकी बुरी भाति मीच है । उहो है मलेच्छ उही चंडाल बुरे तें बुरौ, संतन की निंदा करै सु तौ महानीच है ॥२७॥ (२६) भजनीक-भजन करने वाला । आखुटि-ठोकर खाकर । (२७) अघ-पाप । मीच-मौत । मलेछ-मलेच्छ ।