भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 284 में से

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पृष्ठ 166

॥ विपर्यय यशब्द को अङ्ग ॥ [ १५७ राजा फिरै विपति कौ मार्यौ, घर घर टुकरा मागै भीख । पाव पियादौ निसि दिन डोलै, घोरा चाल सकै नहि वीख ॥ आक अरण्ड की लकरी चूपै, छाडै बहुत रस हि भरे ईख । सुन्दर कोउ जगत मैं विरलौ, या मूरख कौ लावै सीख ॥२५॥ पानी जरै पुकारै निसि दिन, ताकौं अग्नि बुझावै आइ । हूं शीतल तूं तप्त भयौ क्यों, बारवार कहै समझाइ ॥ मेरी लपट तोहि जो लागै, तौ तूं भी शीतल ह्वै जाइ । कबहूं जरनि फेरि नहि उपजै, सुन्दर सुख मैं रहै समाइ ॥२६॥ खसम पर्यो जोरु के पीछे, कह्यौ न मानै भौंही रांट । जित नित फिरै भटङ्गी वोही, मैं तौ त्रिये रकत के भांइ ॥ हौं हू भूख न भागी मेरी, तूं निसि रोटी मागै काइ ।

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