सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ स्वरूप बिसमरण को अंग ॥ [ १७५ आपु न देखत है अपनौ मुख, दर्पन काट लग्यौ अति थूला। ज्यौ दृग देखत तें रहि जात, भयौ जबही पुतरी परि फूला॥ छाइ अज्ञान रह्यो अभि अंतरि, जांनि सकै नहिं आतम मूला। सुन्दर यौ उपज्यो मन कै मल, ज्ञान बिना निजरूपहि भूला॥२२॥ दीन हुवौ बिललात फिरै नित, इंद्रिनि कै बस छीलक छोलै। सिंह नही अपनौ बल जानत, जबुक ज्यौ जितही तित डोलै॥ चेतनता बिसराइ निरतर, लै जडता भ्रम गाठि न खोलै। सुन्दर भूलि गयौ निज रूप हि, देह स्वरूप भयौ मुख बोलै॥२३॥ मै सुखिया सुख सेज सुखासन, है गय भूमि महा रजधानी। हौ दुखिया दिन रैनि भरौ दुख, मोहि विपत्ति परी नही छानी॥