सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ सांख्य ज्ञांन को अंग ॥ [ १७७ अथ सांख्य ज्ञांन को अंग ॥२५॥ मनहर छंद क्षिति जल पावक पवन नभ मिलि करि, शबद रु सपरस रूप रस गंध जू । श्रोत्र त्वक चक्षु घ्रान रसना रस कौ ज्ञान, वाक् पानि पाद पायु उपस्थ हि बध जू ॥ मन बुद्धि चित अहकार ये चौबीस तत, पचंबिश जीव तत करत है धध जू । षड विश कौ है ब्रह्म सुन्दर सु निहकर्म, व्यापक अखंड एक रस निरसध जू । १॥ श्रोत्र दिक् त्वक् वायु लोचन प्रकाश रवि, नासिका अश्वनी जिव्हा बरुन बखानिये । वाक अग्नि हस्त इन्द्र चरन उपेन्द्र बल, मेढ प्रजापति गुदा मित्र हू कौ ठानिये ॥ मन चन्द्र बुद्धि बिधि चित बासुदेव श्राहि, अहकार रुद्र कौ प्रभाव करि मानिये । (१) क्षिति-पृथ्वी । पावक-तेज. अग्नि । पवन-वायु । नभ-आकाश । वाक्-वाणी । पानि-हाथ । पाद-पैर । पायु-मलेन्द्रिय । उपस्थ-मूत्रेन्द्रिय । पचविंश-पचीसवा । षड्विंश-छब्बीसवा । निहकर्म-निष्कर्म । निरसध-संधि रहित-निरवयव ।