सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१७८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जाकी सत्ता पाइ सब देवता प्रकाशत है, सुन्दर सु आतमा हि न्यारौ करि जानिये ॥२॥ इन्दव छन्द श्रोत्र सुनै दृग देखत हैं, रसना रस घ्रान सुगंध पियारौ । कोमलता त्वक् जानत है पुनि, बोलत है मुख शब्द उचारौ ॥ पानि ग्रहै पद गौन करै, मल मूत्र तजै उभऊ अध द्वारौ । जाके प्रकाश प्रकाशत हैं सब, सुन्दर सोई रहै घट न्यारौ ॥३॥ बुद्धि भ्रमै मन चित्त भ्रमै, अहंकार भ्रमै कहा जांनत नांही । श्रोत्र भ्रमै त्वक् घ्रान भ्रमै, रसना दृग देखि दसौ दिसि जाही ॥ वाक् भ्रमै कर पाद भ्रमै, गुदद्वार उपस्थ भ्रमै कँहु काही । तेरे भ्रमाये भ्रमै सबही गुन, सुन्दर तू क्यौ भ्रमै इन 'माहीं ॥४॥ (२) उपेन्द्र-विष्णु। मेढ-मेढ्र, उपस्थ। प्रजापति-ब्रह्मा । विधि-ब्रह्मा। वासुदेव-विष्णु । रुद्र-शंकर ।