भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १७६ बुद्धि कौ बुद्धि रु चित्तकौ चित्त, अह कौ ग्रह मन कौ मन वोई । नैन कौ नैन है बैन कौ बैन है, कान कौ कान त्वचा त्वक् होई ।1 घ्रान कौ घ्रान है जीभ कौ जीभ है, हाथ कौ हाथ पगौ पग दोई । शीश कौ शीश है प्रान कौ प्रांन है, जीव कौ जीवहै सुन्दर सोई ॥५॥ मनहर छंद (प्रश्न) कसै कै जगत यह रच्यौ है जगतगुरु, मौ सौ कहौ प्रथम ही कौन तत्व कीनौ है । प्रकृति कि पुरुष कि महत्तत अहकार, किधौ उपजाये सत रज तम तीनौ है ।1 किधौ व्योम वायु तेज आप कै अवनि कीन, किधौ पंच विषय पसारि करि लीनौ है । किधौ दस इन्द्री किधौं अन्तहकरन कीन, सुन्दर कहंत किधौं सकल विहीनौ है ॥६॥ उत्तर ब्रह्म तै पुरुष अरु प्रकृति प्रगट भई, प्रकृति तै महत्तत्त पुनि अहंकार है । अहकार हू तै तीन गुन सत रज तम, तम हू तै महाभूत विषय पसार है ।1