भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

१८० ] ।। सुन्दर विलास ।। रज हूं तैं इन्द्रिय दस पृथक पृथक भई, सत हूं तैं मन आदि देवता विचार है । ऐसे अनुक्रम करि सिष्य सौं कहत गुरु, सुन्दर सकल यह मिथ्या भ्रम जार है ॥७॥ प्रश्न ? मेरौ रूप भूमि है कि मेरौ रूप आप है कि, मेरौ रूप तेज है कि मेरौ रूप पौन है ? मेरौ रूप व्योम है कि मेरौ रूप इन्द्रिय है कि, अन्त करन है कि बैठौ है कि गौन है ॥ मेरौ रूप त्रिगुन कि अहकार महत्तत्त, प्रकृति पुरुष किधौ बोले है कि मौन है । मेरौ रूप थूल है कि सुनि आदि मेरौ रूप, सुन्दर पूछत गुरु मेरौ रूप कौन है ॥८॥ उत्तर तूं तौ कछु भूमि नाहि आप तेज वायु नांहि, व्योम पच विषै नाहि सौ तौ भ्रम कूप है । तू तो कछु इन्द्रिय अरु अन्तहकरन नाहि, तीनौ गुनहू तू नाहि सोऊ छाह धूप है ॥ तूं तौ अहकार नाहि पुनि महत्तत्त नाहिं, प्रकृति पुरुष नाहि तू तौ सु अनूप है । (८) आप-जल । पौन-पवन, वायु । व्योम-आकाश । गौन-गमन ।