भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 190

॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८१ सुन्दर बिचारि ऐसे सिष्य सौ कहत गुरु, नांहि नाहि करते रहे सु तेरौ रूप है ॥६॥ तेरौ तौ स्वरूप है अनूप चिदानंद घन, देह तौ मलीन जड या विवेक कीजिये । तूं तौ बिहसंग निराकार अविनाशी अज, देह तौ बिनाशवत ताहि नहिं धीजिये ॥ तू तौ षट उरमी रहित सदा एक रस, देह के बिकार सब देह सिर दीजिये । सुन्दर कहत यौ बिचारि आपु भिन्न जानि, पर की उपाधि कहा आप खेंचि लीजिये ॥१०॥ देह ई नरक रूप दुख, कौ न वारपार, देह ई स्वरग रूप झूठौ सुख मान्यौ है । देह ई कौ वध मोक्ष देह ई अप्रोक्ष प्रोक्ष, देह ई के क्रिया कर्मँ शुभाशुभ ठान्यौ है ॥ देह ई मैं और देह, खुशी व्है बिलास करै, ताहि कौं समुझि बिन आतमा बखान्यौ है । दोऊ देह तै अलिप्त दोऊ कौ प्रकाशक है, सुन्दर चैतन्य रूप न्यारौ कर जान्यौ है ॥११॥ (१०-११) षट् ऊर्मि-शीत-उष्ण, भूख-प्यास, सुख-दुःख । प्रोक्ष परोक्ष । अप्रोक्ष-अपरोक्ष । दो देह-स्थूल, सूक्ष्म ।