सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ देह हलै देह चलै देह ही सौ देह मिलै, देह खाद देह पीवै देह ही भरतु है । देह ही हिमारै गरै, देह ही पावक जरै, देह रन माँहि झूझ, देह ही परतु है ॥ देह ही अनेक कर्म करत बिबिध भांति, चुंबक की सत्ता पाइ लोह ज्यों फिरतु है । आतमा चेतनरूप व्यापक साक्षी अनूप, सुन्दर कहत सौ तौ जन्मै न मरतु है ॥१२॥ देह की न देह कछु देह कौ ममत छाडि, देह तौ दमामा दीयै देह देह जात है । घट तौ घटत घरी बरी घट नाश होत, घट के गये नै घट की न फेरि बात है ॥ पिंड पिंड माहि पिंड पिंड कौ उपावत है, पिंड पिंड खात पुनि पिंड ही कौ पात है । सुन्दर न होइ जासौ सुन्दर कहत जग, सुन्दर चेतनरूप सुन्दर विख्यात है ॥१३॥ प्रश्नोत्तर देहू यह किनको है ? देह पंच भूतन की, पंच भूत कीन ते है ? तामसाहंकार त । अहंकार कीन ते है ? जाकौ महत्तत कहें, महत्तत कीन ते है ? प्रकृति मझार ते ॥