भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 192

॥ साख्य ज्ञान को अग ॥ [ १८३ प्रकृति हू कौन तै है ? पुरुष है जाकौ नाम, पुरुष सु कौन तै है ? ब्रह्म निराधार तै । ब्रह्म अब जान्यौ हम, जान्यौ है तौ निश्चै कर, निश्चै हम कियौ है तौ चुप मुख द्वार तै ॥१४॥ एक घट मांहि तौ सुगध जल भरि राख्यो, एक घट मांहि तौ दुर्गन्ध जल भर्यौ है । एक घट माहि पुनि गंगोदक राख्यो आन, ' एक घट माहि आनि मदिराऊ कर्यौ है ॥ एक घृत एक तेल एक माहि लघुनीति, सबही मैं सविता कौ प्रतिबिब पर्यौ है । तैसे ही सुन्दर 'ऊच नीच मध्य एक ब्रह्म, देह भेद देखि भिन्न भिन्न नाम धर्यौ है ॥१५॥ भूमि परै अप, अपहू कै परै पावक है, पावक कै परै पुनि वायु हू बहुत है । वायु परै व्योम व्योम हू कै परै इन्द्रिय दस, इन्द्रिनि कै पर अन्त.करन रहतु है ॥ अन्तहकरन परै तीनौ गुन 'अहकार, अहकार परै महत्तत कौ लहतु है । महत्तत्त परै मूल माया, माया परै ब्रह्म, ताहि तै परात्पर सुन्दर कहतु है ॥१६॥ (१५) सविता-सूर्य । लघुनीति-पेशाब । (१६) परात्पर-सबसे परे, ऊपर ।